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राजनीति

फंड खर्च पर सवाल: उत्तराखंड के विधायक नहीं कर पाए 34 फीसदी राशि का उपयोग

उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एक बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक मुद्दा सामने आया है, जहाँ राज्य के माननीय विधायक अपने विकास फंड का एक बड़ा हिस्सा खर्च करने में विफल रहे हैं।

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Ankit Yadav
11 सित 2026, 13:41
फंड खर्च पर सवाल: उत्तराखंड के विधायक नहीं कर पाए 34 फीसदी राशि का उपयोग
उत्तराखंड के राजनीतिक गलियारों में इस समय हलचल तेज हो गई है क्योंकि राज्य में विधानसभा चुनाव बेहद करीब आ चुके हैं और इसी बीच जनप्रतिनिधियों के प्रदर्शन को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पहाड़ी राज्य के विधायक अपने विकास कार्यों के लिए मिलने वाले कुल फंड का अभी तक 34 फीसदी हिस्सा खर्च नहीं कर पाए हैं। इतनी बड़ी मात्रा में राशि का बचा रह जाना प्रशासनिक सुस्ती और क्षेत्रीय विकास के प्रति गंभीरता की कमी को साफ तौर पर दर्शाता है। निर्वाचन क्षेत्र के विकास के लिए मिलने वाले इन पैसों का समय पर उपयोग न होना जनता के बीच भी चर्चा का एक बड़ा विषय बनता जा रहा है।

विकास कार्यों पर असर और प्रशासनिक सुस्ती

चुनाव सिर पर होने के बावजूद विधायकों द्वारा इस तरह से धन का उपयोग न कर पाना कई तरह के गंभीर सवाल खड़े करता है। हर विधायक को अपने क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास, सड़क निर्माण, पेयजल, और अन्य जनहित के कार्यों के लिए एक निर्धारित बजट मिलता है। यदि इस बजट का एक तिहाई हिस्सा यानी 34 फीसदी राशि खातों में ही पड़ी रह जाती है, तो इसका सीधा मतलब यह है कि जनता तक वे सुविधाएं समय पर नहीं पहुंच पाईं जिनका वादा किया गया था। इस प्रकार की स्थिति अक्सर तब बनती है जब प्रशासनिक स्तर पर प्रस्तावों को मंजूरी मिलने में देरी होती है या फिर विभागों के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी देखने को मिलती है। जनता और विपक्षी दलों की ओर से इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। लोगों का कहना है कि जब क्षेत्र की वास्तविक जरूरतों के लिए पैसा उपलब्ध था, तो उसे खर्च क्यों नहीं किया गया। चुनाव नजदीक होने के कारण राजनेता अब जनता के बीच जा रहे हैं, लेकिन फंड का पूरा उपयोग न हो पाने के कारण उन्हें मतदाताओं के कड़े सवालों का सामना भी करना पड़ रहा है। कई स्थानीय संगठनों का मानना है कि विकास के मोर्चे पर यह लापरवाही पूरी तरह से अस्वीकार्य है और इससे राज्य के समग्र विकास की रफ्तार पर ब्रेक लगा है। आगामी राजनीतिक समीकरणों पर भी इस बात का असर पड़ना तय माना जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान विपक्षी दल इस मोर्चे पर मौजूदा जनप्रतिनिधियों को घेरने की पूरी तैयारी में हैं। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इस वित्तीय पिछड़ेपन और प्रशासनिक नाकामी पर जनता के बीच क्या सफाई देते हैं। जनता अब केवल आश्वासनों पर भरोसा करने के बजाय धरातल पर हुए कामों का हिसाब मांग रही है, और यह रिपोर्ट राजनेताओं की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
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