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राजनीतिक चर्चा: क्या वर्ष 2029 में देश में लागू हो सकेगा 'एक राष्ट्र-एक चुनाव'?
देश में एक साथ चुनाव कराने की अवधारणा को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। हाल ही में हुई संयुक्त संसदीय समिति की बैठक में कई प्रमुख विपक्षी नेता शामिल हुए, जिसमें प्रियंका गांधी की मौजूदगी ने विशेष ध्यान आकर्षित किया।
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Ankit Yadav
24 अग 2026, 19:04
भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक बार फिर से समूचे देश में एक साथ चुनाव आयोजित कराने के प्रस्ताव पर गंभीर विचार-विमर्श शुरू हो गया है। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए हाल ही में संसद की एक महत्वपूर्ण समिति की बैठक बुलाई गई, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के दिग्गज नेताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस उच्चस्तरीय बैठक का मुख्य उद्देश्य देश भर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक ही समय पर कराने की संभावनाओं का गहराई से विश्लेषण करना था। बैठक के दौरान इस बात पर भी मंथन किया गया कि क्या प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर तैयारी करते हुए वर्ष 2029 तक इस महत्वाकांक्षी योजना को धरातल पर उतारा जा सकता है या नहीं।
विपक्षी नेताओं की सक्रिय भागीदारी
इस अहम बैठक में विपक्षी दलों के कई कद्दावर नेताओं ने शिरकत की, जिनमें कांग्रेस पार्टी की प्रमुख नेता प्रियंका गांधी वाड्रा का नाम भी शामिल था। उनकी इस बैठक में उपस्थिति को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा विभिन्न प्रकार के कयास लगाए जा रहे हैं। विपक्षी दलों का रुख इस विषय पर काफी सतर्क नजर आ रहा है, क्योंकि वे इस बात का आकलन करने का प्रयास कर रहे हैं कि एक साथ चुनाव कराने से देश की संघीय व्यवस्था और क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ेगा। बैठक के दौरान विपक्षी प्रतिनिधियों ने कई तीखे सवाल भी उठाए और सरकार के समक्ष अपनी आपत्तियां तथा चिंताएं खुलकर रखीं, ताकि इस प्रस्ताव के हर एक पहलू का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जा सके।
समिति के समक्ष विभिन्न कानूनी विशेषज्ञों, संवैधानिक जानकारों और निर्वाचन आयोग से जुड़े पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा किए जाने की संभावना है। देश में लोकसभा और तमाम राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से होने वाले वित्तीय लाभों और प्रशासनिक सहूलियत के तर्कों के साथ-साथ इसके व्यावहारिक संकटों पर भी विचार किया जा रहा है। आलोचकों का मानना है कि इस प्रकार के बड़े बदलाव के लिए देश के संविधान में व्यापक संशोधन की आवश्यकता पड़ेगी, जिसके लिए संसद के भीतर और बाहर व्यापक आम सहमति बनाना एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। इसके अलावा, सुरक्षा बलों की तैनाती, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की भारी मांग और मतदान केंद्रों के प्रबंधन जैसी लॉजिस्टिक संबंधी समस्याएं भी इसके मार्ग में बड़े अवरोध पैदा कर सकती हैं।
भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों और इस प्रस्ताव के संभावित परिणामों को लेकर आने वाले दिनों में बहस और अधिक तेज होने के आसार हैं। जैसे-जैसे वर्ष 2029 का समय नजदीक आएगा, वैसे-वैसे इस दिशा में उठाए जाने वाले कदमों और राजनीतिक दलों के रुख में और अधिक स्पष्टता देखने को मिलेगी। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर लगातार खींचतान जारी रहने की पूरी उम्मीद है, क्योंकि हर एक दल अपने राजनीतिक नफे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए इस नीति पर अपनी अंतिम प्रतिक्रिया तय कर रहा है। फिलहाल, समिति की यह बैठक इस बड़े राजनीतिक मंथन की शुरुआत मात्र है और आने वाले हफ्तों में इस पर कई और दौर की तीखी चर्चाएं होने की पूरी संभावना बनी हुई है।