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राजनीतिक घमासान: अभिजीत दीपके का भाजपा पर 'स्कूल ठीक करो' अभियान को लेकर तीखा हमला

अभिजीत दीपके ने भारतीय जनता पार्टी पर कड़ा प्रहार करते हुए सवाल उठाया है कि आखिर सत्ताधारी दल 'स्कूल ठीक करो' अभियान का विरोध क्यों कर रहा है। उन्होंने खुद को छात्रों की मुख्य ताकत बताया है।

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Ankit Yadav
03 सित 2026, 16:36
राजनीतिक घमासान: अभिजीत दीपके का भाजपा पर 'स्कूल ठीक करो' अभियान को लेकर तीखा हमला
भारतीय राजनीतिक गलियारों में शिक्षा के बुनियादी ढांचे और सुधारों को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। हालिया बयानों के सिलसिले में नेता अभिजीत दीपके ने भारतीय जनता पार्टी पर सीधा निशाना साधा है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह सवाल पूछा है कि आखिर किस वजह से विपक्षी या सत्ता पक्ष के लोग शिक्षण संस्थानों की दशा सुधारने से जुड़े अभियानों का विरोध करते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में शैक्षणिक व्यवस्थाओं की स्थिति और उनमें सुधार की मांगों को लेकर राजनीति गरमाई हुई है। दीपके के इस तीखे बयान ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है, जहां शिक्षा के मुद्दों पर दलों के बीच खींचतान लगातार जारी रहती है।

छात्रों की 'ए टीम' होने का दावा

अभिजीत दीपके ने अपने संबोधन के दौरान खुद को और अपने समर्थकों को छात्रों की 'ए टीम' करार दिया। उनका कहना था कि वे विद्यार्थियों के अधिकारों और उनकी शिक्षा की बेहतरी के लिए मैदान में डटे हुए हैं। दीपके के मुताबिक, जब भी शिक्षण संस्थानों के उत्थान या बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाता है, तो कुछ राजनीतिक दल उसका विरोध करने लगते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को बेनकाब किया जाएगा और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की यह मुहिम किसी भी कीमत पर रुकने वाली नहीं है। उनके इस दावे ने युवा वर्ग और छात्र संगठनों के बीच खासी चर्चा बटोरी है, जो इसे शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की सुगबुगाहट मान रहे हैं। शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति देश भर में हमेशा से एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। सरकारी और अर्ध-सरकारी स्कूलों की बदहाली, शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव ऐसे विषय हैं जिन पर अक्सर राजनीतिक दल आमने-सामने आ जाते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के अभियानों का विरोध करना राजनीतिक दलों के लिए भारी पड़ सकता है, क्योंकि युवा मतदाता अब शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर अधिक मुखर हो रहे हैं। अभिजीत दीपके की यह टिप्पणी इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसके जरिए वे युवाओं और छात्रों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी और तेज होने के पूरे आसार हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से इस मामले में अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ता सक्रिय हो गए हैं। शिक्षा सुधार आंदोलनों से जुड़े संगठनों का कहना है कि बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करना किसी एक दल की नहीं बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। ऐसे में जब राजनेता इस पर आमने-सामने आ रहे हैं, तो आम जनता और अभिभावकों की निगाहें भी इस बात पर टिकी हैं कि क्या वास्तव में स्कूलों की स्थिति में सुधार लाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे या यह केवल बयानबाजी तक ही सीमित रहकर रह जाएगा।
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