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राजनीति

सांस्कृतिक संदेश: लंदन में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू सोच में अपनापन सबसे ऊपर है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने लंदन की अपनी यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण वैचारिक संबोधन दिया, जिसमें उन्होंने भारतीय संस्कृति और हिंदू दर्शन के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला।

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Ankit Yadav
07 सित 2026, 13:36
सांस्कृतिक संदेश: लंदन में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू सोच में अपनापन सबसे ऊपर है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत इन दिनों अपनी विदेश यात्रा के तहत लंदन में मौजूद हैं, जहां उन्होंने अपने संबोधन के दौरान भारतीय संस्कृति, दर्शन और सनातन मूल्यों से जुड़े कई अहम बिंदुओं पर खुलकर बात की। अपने संबोधन में उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि पारंपरिक हिंदू सोच और वैचारिक परंपरा में अपनेपन की भावना को हमेशा से सर्वोच्च स्थान दिया गया है। उनके इस बयान को दुनिया भर में फैले भारतीय प्रवासियों के बीच सांस्कृतिक और वैचारिक एकजुटता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

लंदन में संघ प्रमुख का संबोधन और वैश्विक परिप्रेक्ष्य

लंदन में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों और बैठकों के दौरान मोहन भागवत ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय विचार धारा कभी भी संकुचित नहीं रही है, बल्कि यह हमेशा से संपूर्ण मानवता को अपने परिवार के रूप में देखती है। उन्होंने समझाया कि हिंदू संस्कृति की मूल आत्मा में सभी के प्रति अपनत्व, आत्मीयता और सह-अस्तित्व की भावना समाहित होती है। संघ प्रमुख के इस प्रकार के वैचारिक वक्तव्य अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की प्राचीन जीवन शैली और उसके सार्वभौमिक संदेश को रेखांकित करने का काम करते हैं।

लखनऊ और उत्तर प्रदेश में भी रही बयान की चर्चा

मोहन भागवत के इस लंदन दौरे और उनके इस विशिष्ट बयान की गूं केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित पूरे राज्य के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में भी इस पर व्यापक चर्चा देखने को मिली। लखनऊ के विभिन्न वैचारिक मंचों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात की सराहना की कि कैसे संघ प्रमुख समय-समय पर वैश्विक मंचों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के वसुधैव कुटुंबकम के संदेश को जीवंत बनाए रखते हैं। जानकारों का मानना है कि ऐसे विचार आधुनिक दुनिया में उत्पन्न होने वाली दूरियों और मतभेदों को पाटने में मददगार साबित हो सकते हैं। संघ प्रमुख के इन विचारों का उद्देश्य प्रवासी भारतीयों को उनकी जड़ों से जोड़े रखना और अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने की प्रेरणा देना भी रहा है। इस प्रकार के आयोजनों से विदेशों में रह रहे भारतीय समुदाय के भीतर अपनी संस्कृति के प्रति जुड़ाव और अधिक मजबूत होता है। आने वाले दिनों में उनके इस दौरे और दिए गए संदेश के कई दूरगामी सामाजिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं, जो वैचारिक संवाद को और अधिक प्रगाढ़ बनाएंगे।
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