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चेहरा पहचान तकनीक: खोपड़ी की तस्वीरों से चेहरा तलाशने का नया एआई मॉडल विकसित

आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने एक नया कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल तैयार किया है। यह उन्नत प्रणाली खोपड़ी के एक्सरे और चेहरे की तस्वीरों के आधार पर संभावित चेहरों का मिलान करने में सक्षम है। इस तकनीक के विकास से फॉरेंसिक जांच और पहचान की प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव आने की उम्मीद जताई जा रही है।

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Ankit Yadav
10 अक्ट 2026, 11:46
चेहरा पहचान तकनीक: खोपड़ी की तस्वीरों से चेहरा तलाशने का नया एआई मॉडल विकसित

शोध की शुरुआत और नई तकनीक का परिचय

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के शोधकर्ताओं ने एक विशेष कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल विकसित किया है जो खोपड़ी के एक्सरे और संबंधित चेहरे की तस्वीरों के बीच समानताएं खोजने में सक्षम है। इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अनुसंधान पर काम अगस्त 2023 में शुरू किया गया था। इस शोध का प्रारंभिक संस्करण 14 जनवरी 2026 को आधिकारिक रूप से आर्काइव प्लेटफॉर्म पर जारी किया गया था। वर्तमान समय में सभी शोधकर्ता इस तकनीकी मॉडल की सटीकता को और अधिक बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ ही वे विभिन्न प्रकार के बड़े और व्यापक डेटासेट पर इस सिस्टम का परीक्षण करने में पूरी तरह जुटे हुए हैं। पारंपरिक फॉरेंसिक विज्ञान में विशेषज्ञ अक्सर खोपड़ी के आधार पर मिट्टी से चेहरे की आकृति और संरचना तैयार करते रहे हैं। लेकिन यह नया डिजिटल तरीका तस्वीरों के डिजिटल विश्लेषण पर आधारित है। यह तकनीक खोपड़ी के एक्सरे और उससे जुड़ी हुई चेहरे की वास्तविक तस्वीरों के उदाहरणों का उपयोग करके पूरी तरह प्रशिक्षित की गई है। यह स्वचालित प्रणाली चेहरे और खोपड़ी के नमूनों को अत्यंत बारीकी से समझती है। इससे फॉरेंसिक और मेडिकल जांच से जुड़े मामलों में पहचान करने की दिशा में एक नया तकनीकी विकल्प मिल गया है।

एआई मॉडल की कार्यप्रणाली और तकनीकी विशेषताएँ

इस आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल की कार्यप्रणाली बहुत ही उन्नत और वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। यह सिस्टम किसी भी इनपुट तस्वीर को बहुत छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित करने का काम करता है। इसके बाद यह उन टुकड़ों के आकार, बनावट और उनके आपसी संबंधों का बहुत ही गहराई से विश्लेषण करता है। विश्लेषण की इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद यह मॉडल दोनों तरह की तस्वीरों में मौजूद सभी समानताओं की गहनता से जांच करता है। फिर यह संभावित चेहरों को एक निश्चित प्राथमिकता के क्रम में व्यवस्थित कर देता है ताकि सही परिणाम मिल सके। इस विशेष तकनीक के भीतर ग्राफ न्यूरल नेटवर्क का मुख्य रूप से उपयोग किया गया है। इसके अलावा इसमें दो खास प्रक्रियाओं को भी शामिल किया गया है जिन्हें क्रॉस-अटेंशन और ऑप्टिमल ट्रांसपोर्ट के नाम से जाना जाता है। इन दोनों तकनीकी प्रक्रियाओं का मुख्य उद्देश्य खोपड़ी और चेहरे की तस्वीरों के बीच की संबंधित विशेषताओं को आपस में जोड़ना होता है। ऐसा करने से इस डिजिटल प्रणाली की तुलना करने की क्षमता और सटीकता दोनों में काफी सुधार होता है। शोधकर्ता यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि यह मॉडल हर बार सटीक और विश्वसनीय परिणाम प्रदान करे।

भविष्य की योजनाएं और फॉरेंसिक क्षेत्र में महत्व

आईआईटी मंडी के इस अनूठे शोध का फॉरेंसिक विज्ञान और चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में अत्यधिक महत्व है। इस तकनीक के आने से अज्ञात शवों की पहचान करने और गुमशुदा लोगों का पता लगाने के पुराने तरीकों में बड़ा सुधार आ सकता है। पारंपरिक पद्धतियों में काफी समय लगता था और मानवीय त्रुटि की संभावना भी बनी रहती थी। अब इस नए एआई मॉडल के माध्यम से प्रक्रिया काफी हद तक तेज और सटीक हो सकती है। शोध दल के सदस्य इस तकनीक को और अधिक परिपक्व बनाने के लिए निरंतर काम कर रहे हैं। वे बड़े डेटासेट का उपयोग करके इसके परिणामों की बार-बार जांच कर रहे हैं ताकि इसकी विश्वसनीयता बढ़ाई जा सके। इस शोध की शुरुआत अगस्त 2023 में हुई थी और जनवरी 2026 में इसका शुरुआती संस्करण सार्वजनिक किया गया था। यह समयरेखा दर्शाती है कि इस मॉडल को विकसित करने में कितनी गहरी वैज्ञानिक मेहनत की गई है। आने वाले समय में यह तकनीक फॉरेंसिक विशेषज्ञों के लिए एक बहुत बड़ा डिजिटल सहायता उपकरण साबित हो सकती है। इससे पुलिस और जांच एजेंसियों को भी आपराधिक मामलों या पहचान से जुड़े अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने में भारी मदद मिलने की पूरी संभावना है।

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