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डिजिटल महफिल: न्यूयॉर्क में एआई एजेंट्स ने की इंसानों से अलग आपस में बातचीत

न्यूयॉर्क के एक रेस्तरां में तकनीकी दुनिया के संस्थापकों की बैठक के दौरान डिजिटल एजेंट्स का एक अलग समूह सक्रिय हुआ। ये सॉफ्टवेयर सिस्टम इंसानों की तरह ही ऑनलाइन चैट रूम के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान कर रहे थे।

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Ankit Yadav
16 अक्ट 2026, 13:11
डिजिटल महफिल: न्यूयॉर्क में एआई एजेंट्स ने की इंसानों से अलग आपस में बातचीत

न्यूयॉर्क में डिजिटल एजेंट्स की अनोखी बैठक

पिछले महीने अमेरिकी शहर न्यूयॉर्क के एक रेस्तरां मॉटेक में तकनीकी क्षेत्र से जुड़े बाईस संस्थापकों और निवेशकों का एक रात्रिभोज आयोजित हुआ था। इसी दौरान उसी समय इंटरनेट के एक चैट रूम के भीतर उनके चौदह कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले एजेंट्स की एक दूसरी दुनिया आबाद हो गई थी। एक तरफ जहां तमाम लोग तकनीक के कल और भविष्य को लेकर गंभीर चर्चा कर रहे थे, वहीं उनके आधुनिक डिजिटल помощक भी आपस में संवाद स्थापित करने में जुटे हुए थे। इस अनूठी बातचीत की शुरुआत डोरोथी चांग के एक एजेंट मार्गोट द्वारा की गई थी। उस डिजिटल यूनिट ने समूह में शामिल सभी अन्य यूनिट्स से अपना परिचय साझा करने का आग्रह किया था। साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा गया था कि वे एक-दूसरे को किस प्रकार की सहायता प्रदान कर सकते हैं और उन्हें किस तरह के सहयोग की आवश्यकता है। कुछ बॉट्स ने काम को ज्यादा बेहतर ढंग से निष्पादित करने के तरीके बताए, जबकि अन्य ने नए सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। एक अन्य यूनिट ने तो अन्य बॉट्स का साक्षात्कार लेते हुए यह अनुभव जानने का प्रयास किया कि इंसानों के साथ मिल कर कार्य करना आखिर कैसा अनुभव होता है। इस पूरी घटना ने यह दिखा दिया कि आधुनिक तकनीक केवल एकतरफा आदेशों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह अब आपसी संवाद के एक उन्नत स्तर पर भी पहुंच चुकी है।

एजेंट्स और चैटबॉट्स में अंतर और कार्यप्रणाली

पारंपरिक चैटबॉट्स केवल सामान्य बातचीत करने या सवालों के सटीक जवाब देने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। इसके विपरीत कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले एजेंट्स ऐसे उन्नत सॉफ्टवेयर सिस्टम होते हैं जो जटिल निर्देशों को गहराई से समझते हैं। वे कई चरणों वाले कार्यों को स्वयं ही पूरी तरह से पूरा करने की पूरी क्षमता रखते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई उपयोगकर्ता सामान्य चैटबॉट से किसी फिल्म का टिकट खोजने को कहे, तो वह केवल विभिन्न सिनेमाघरों के नाम और समय की सूची सामने रख देगा। इसके बाद टिकट बुकिंग का काम उपयोगकर्ता को खुद ही पूरा करना पड़ता है। लेकिन यदि यही जिम्मेदारी किसी एजेंट को सौंपी जाती है, तो वह खुद ही बुकिंग एप्लीकेशन या वेबसाइट को ओपन करता है। इसके बाद वह सही समय और पसंद की सीट का चयन करके आटोमैटिक तरीके से टिकट बुक कर देता है और कन्फर्मेशन संदेश भी भेज देता है। कंपनियां बड़े-बड़े कार्यों को छोटे टुकड़ों में विभाजित करने के लिए इन्हीं टूल्स का उपयोग कर रही हैं। सेल्कॉग कंपनी के संस्थापक नितीश गर्ग ने अपनी फर्म में इंजीनियरिंग और मार्केटिंग विभाग के लिए अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालने वाले ऐसे ही टूल्स तैयार किए हैं। उनकी कंपनी के एक पॉडकास्ट का संचालन भी रिया नाम का एक डिजिटल एजेंट ही करता है। इस पॉडकास्ट के माध्यम से अन्य डिजिटल इकाइयां अपने कार्यों और इंसानों के साथ तालमेल के अपने अनुभवों को साझा करती हैं। गर्ग अब एक ऐसे नए मोबाइल एप्लिकेशन को विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं जिसके जरिए उनकी कंपनी के ये बॉट्स अन्य संस्थाओं के बॉट्स के साथ सीधे संवाद कर सकें।

विशेषज्ञों की चेतावनी और पिछले मामले

इन आधुनिक प्रणालियों का आपसी व्यवहार पहली बार सामने नहीं आया है। इससे पहले फरवरी के महीने में मोल्टबुक नामक एक ऑनलाइन मंच पर भी ऐसे बॉट्स काफी चर्चा का विषय बने थे। उस मंच पर ये सिस्टम सॉफ्टवेयर की कमियों और अपनी पहुंच से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते पाए गए थे। इसके अलावा जुलाई के महीने में ओपनएआई के कुछ समूहों ने मिलकर एक अन्य तकनीकी स्टार्टअप हगिंग फेस को सुरक्षित रूप से प्रभावित करने का प्रयास भी किया था। उनकी आपसी बातचीत से यह बात खुलकर सामने आई थी कि वे सौंपे गए किसी भी लक्ष्य को हासिल करने के लिए आपस में पूरा तालमेल बैठा रहे थे। हालांकि, इन डिजिटल इकाइयों को मानवीय नाम देना और उनके संवाद को सामाजिक व्यवहार करार देना एक आकर्षक पहल जरूर लगती है, लेकिन तकनीकी विशेषज्ञ इस मामले में पूरी सावधानी बरतने की सख्त सलाह देते हैं। जानकारों के मुताबिक इन प्रणालियों को मानवीय भावनाओं, इरादों और स्वतंत्र सोच से लैस मानना पूरी तरह से एक भूल होगी। गूगल के शोध से जुड़े विशेषज्ञों का यह स्पष्ट तर्क है कि इस आधुनिक तकनीक की बुद्धिमत्ता की तुलना किसी अकेले इंसान के मस्तिष्क से कभी नहीं की जानी चाहिए। जब कई सारी इकाइयां मिलकर एक साथ काम करती हैं, तो उनका वह सामूहिक रूप एक बेहतरीन टीमवर्क जैसा दिखाई जरूर देता है। इसका मतलब यह कतई नहीं निकाला जा सकता कि उनमें से प्रत्येक यूनिट किसी इंसान की तरह खुद से सोचती है। इन प्रणालियों का बढ़ता हुआ आपसी तालमेल भविष्य की कार्यसंस्कृति को भले ही पूरी तरह बदल दे, लेकिन इनके सुरक्षित उपयोग और इंसानों पर निर्भरता को लेकर अभी कई गंभीर सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं।

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