राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हासिल किया शीर्ष स्थान
मध्य प्रदेश के महू शहर स्थित मिलिट्री कालेज आफ टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग के तकनीकी रूप से दक्ष सैनिकों और शोधकर्ताओं की टीम ने एक विशेष प्रणाली का निर्माण किया है। इस अभिनव तकनीक का मुख्य उद्देश्य सेलुलर कंपनियों के पांचवीं और छठी पीढ़ी के नेटवर्क का उपयोग करते हुए हवा में उड़ रहे मानवरहित विमानों को ट्रैक करना है। केंद्रीय दूरसंचार विभाग द्वारा इंडिया मोबाइल कांग्रेस के अंतर्गत एक राष्ट्रीय स्तर की पांचवीं पीढ़ी की नवाचार प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। इस प्रतियोगिता में देश भर के शीर्ष तकनीकी संस्थानों और स्टार्टअप्स ने हिस्सा लिया था। महू के संस्थान का मुकाबला देश के कई प्रमुख संस्थानों और प्रौद्योगिकीीय संस्थाओं के साथ था। इस कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच महू की टीम ने अपनी इस अनूठी खोज के दम पर पूरे देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। दिल्ली में आयोजित इस भव्य पुरस्कार समारोह के दौरान केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस उत्कृष्ट उपलब्धि के लिए संस्थान की पूरी टीम को सम्मानित किया। इस राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन के फलस्वरूप विजेता टीम को ढाई लाख रुपये की नकद राशि के साथ एक आधिकारिक प्रमाण पत्र भी प्रदान किया गया है।
विशेष एंटीना डिजाइन कर सॉफ्टवेयर में किए गए जरूरी बदलाव
वर्तमान समय में किसी भी मानवरहित विमान या छोटे उपकरण की आवाजाही पर नजर रखने के लिए विशेष प्रकार के रडार का उपयोग किया जाता है। हालांकि कई बार पारंपरिक रडार प्रणाली छोटे आकार के मानवरहित विमानों की सही स्थिति का पता लगाने में विफल हो जाती है। इसके अलावा इस तरह के पारंपरिक रडार उपकरणों के संचालन और उपयोग में भारी भरकम वित्तीय खर्च भी करना पड़ता है। इन सभी तकनीकी बाधाओं और समस्याओं को दूर करने के उद्देश्य से महू स्थित संस्थान के पांचवीं और छठी पीढ़ी के उत्कृष्टता केंद्र से जुड़े सैन्य छात्रों तथा प्रशिक्षकों ने मिलकर प्रिज्म तकनीक को ईजाद किया है। इस विशेष प्रणाली को तैयार करने के लिए एक विशिष्ट प्रकार का एंटीना डिजाइन किया गया है और इसके साथ ही पांचवीं पीढ़ी के सॉफ्टवेयर ढांचे में आवश्यक फेरबदल किए गए हैं। इन तकनीकी संशोधनों की मदद से अब दूरसंचार कंपनियों के आधुनिक नेटवर्क के माध्यम से हवा में उड़ रहे विमानों की पहचान करना पूरी तरह सुरक्षित और सुगम हो गया है। इस पूरी शोध परियोजना को ब्रिगेडियर देवेन माखीजा के कुशल निर्देशन में पूरा किया गया है। इस शोध दल में डॉक्टर निखिल शर्मा, लेफ्टिनेंट कर्नल नैनिश लोहाकरे, लेफ्टिनेंट कर्नल निर्झर यादव, नायब सूबेदार बालासुंदरम एम और नायक अनिल कुमार जैसे नाम शामिल हैं जिन्होंने मिलकर पिछले छह महीनों के कड़े परिश्रम के बाद इस उपलब्धि को हासिल किया है।
भविष्य की यातायात व्यवस्था को सुगम बनाएगी यह अनूठी तकनीक
विकसित की गई यह प्रणाली आने वाले समय में देश की सैन्य सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ बनाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसके साथ ही देश की विभिन्न पुलिस इकाइयां भी अपने स्तर पर मानवरहित विमानों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इस तकनीक का प्रभावी उपयोग कर सकेंगी। भविष्य की योजनाओं के तहत मानवरहित विमानों के माध्यम से घरों तक सीधे पार्सल और जरूरी सामान पहुंचाने की प्रक्रिया की शुरुआत की जाएगी। इस भविष्य की व्यवस्था के अंतर्गत चिकित्सा से जुड़े महत्वपूर्ण सामान और अन्य घरेलू उपयोग के उत्पाद मानवरहित विमानों के जरिए सीधे जरूरतमंदों तक पहुंचाए जाएंगे। आने वाले दिनों में जब आकाश में ऐसे विमानों की आवाजाही में भारी वृद्धि होगी तब हवाई मार्गों पर यातायात का दबाव भी काफी बढ़ जाएगा। ऐसी संभावित स्थिति में ये विमान आपस में न टकरा जाएं इसके लिए आसमान में इनके आवागमन के लिए एक सुरक्षित मार्ग तैयार करना आवश्यक हो गया है। इस तकनीक के उपयोग से भविष्य में व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए उपयोग होने वाले विमानों का आसमान में एक निश्चित मार्ग निर्धारित किया जा सकेगा जिससे उनकी आपस में होने वाली टक्करों को पूरी तरह रोका जा सकेगा।