नये मोबाइल नेटवर्क पर उठ रहे सवाल
भारत के भीतर अत्याधुनिक तकनीकी ढांचे को स्थापित करने की दिशा में कार्य चल रहा है लेकिन इसके पूर्ण पैमाने पर धरातल पर उतरने की समयसीमा आगे खिसक सकती है। नई दिल्ली में आयोजित इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 के दौरान सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक एसपी कोचर ने इस संबंध में अहम बातें रखीं। उन्होंने बताया कि इस अगली पीढ़ी के संचार माध्यम के वर्ष 2030 के आसपास आरंभ होने की संभावना जरूर जताई जा रही है। इसके बावजूद संपूर्ण देश में इसका व्यापक प्रसार होने में निर्धारित अवधि से अधिक वक्त लग सकता है। अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस दशक के अंत तक इस तकनीकी की केवल शुरुआती सुगबुगाहट देखने को मिल सकती है। इसे पूरे राष्ट्र में एक साथ बड़े पैमाने पर लागू किया गया पूर्ण विस्तार नहीं माना जाना चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानक तय करने वाली संस्था थर्ड जनरेशन पार्टनरशिप प्रोजेक्ट के माध्यम से कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के विभिन्न संगठन और विशेषज्ञ सक्रिय रूप से अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रहे हैं। देश के भीतर भी इस दिशा में कई घरेलू प्रयास तेजी से बढ़ाए जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर पेटेंट दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसके व्यावहारिक उपयोग के नए तरीकों की तलाश पर पूरा जोर दिया जा रहा है।
मुनाफे और राजस्व की बड़ी चुनौती
दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों के सामने इस नई प्रणाली में भारी पूंजी लगाने को लेकर गंभीर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। उद्योग से जुड़े दिग्गजों का मानना है कि बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर धन लगाने से पहले स्पष्ट व्यावसायिक लाभ का रास्ता दिखना अनिवार्य है। मौजूदा दौर में पांचवीं पीढ़ी की नेटवर्क सेवाओं से कंपनियों को पर्याप्त अतिरिक्त आय देने वाले विशिष्ट अनुप्रयोगों या सेवाओं का अभाव साफ नजर आ रहा है। ऐसे विशेष उपयोग या सेवाओं को किलर एप्लिकेशन कहा जाता है जो किसी नए तंत्र को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए ग्राहकों को प्रेरित करते हैं। जब तक ऐसे प्रभावी साधन उपलब्ध नहीं होंगे तब तक अगली पीढ़ी के इस तंत्र में बड़ा निवेश करने से पहले कंपनियों को कई बार विचार करना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त दूरसंचार क्षेत्र की मौजूदा वित्तीय सेहत भी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। कंपनियों की कुल कमाई और संचालन संबंधी खर्चों के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है जिसके कारण उनके शुद्ध मुनाफे पर भारी दबाव उत्पन्न हो रहा है। नेटवर्क के टावर लगाने से लेकर अन्य जरूरी उपकरण खरीदने और स्पेक्ट्रम प्राप्त करने में कंपनियों को भारी भरकम राशि खर्च करनी पड़ती है। यदि खर्च बढ़ने के मुकाबले उचित रिटर्न प्राप्त नहीं होता है तो नेटवर्क का यह विस्तार जारी रखना अत्यंत कठिन हो जाता है। उद्योग जगत ने सरकार से आग्रह किया है कि वह नियामकीय शुल्कों और स्पेक्ट्रम की कीमतों में आवश्यक राहत प्रदान करे।
सरकारी विजन और भविष्य की राह
भारत सरकार ने मार्च 2023 में देश के लिए एक विशेष विजन दस्तावेज पेश किया था जिसका मुख्य उद्देश्य इस तकनीक की डिजाइन और विकास प्रक्रिया में देश को अग्रणी बनाना है। इस राष्ट्रीय योजना के तहत वैश्विक पेटेंट और मानकों में कम से कम दस प्रतिशत हिस्सेदारी प्राप्त करने का बड़ा लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए घरेलू स्तर पर अनुसंधान कार्यों को बढ़ावा देने के साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की भागीदारी को मजबूत किया जा रहा है। दूसरी ओर यदि कंपनियों की परिचालन लागत इसी प्रकार बढ़ती रही और उन्हें वित्तीय सहायता नहीं मिली तो आखिरी विकल्प के रूप में मोबाइल टैरिफ बढ़ाने का कदम उठाना पड़ सकता है। उद्योग संगठनों ने उम्मीद जताई है कि सरकार लेवी और शुल्कों में कटौती करेगी ताकि उपभोक्ताओं पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त वित्तीय बोझ न पड़े। इस बीच डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करने और ऑनलाइन धोखाधड़ी को रोकने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों का उपयोग भी तेजी से बढ़ाया जा रहा है। मीडियाटेक जैसी दिग्गज कंपनियां भी इस तकनीकी के मानक तय करने वाली अंतरराष्ट्रीय समितियों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। यह तमाम प्रयास इस बात की गवाही देते हैं कि देश का दूरसंचार उद्योग भविष्य की इन चुनौतियों से निपटने के लिए पूरी तरह सक्रिय रूप से अपनी रणनीतियों को आकार दे रहा है।