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वैश्विक चेतावनी: प्रौद्योगिकी और दुर्लभ खनिजों को हथियार नहीं बनाना चाहिए: प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक महत्वपूर्ण वैश्विक बयान में कहा है कि तकनीकी प्रगति और दुर्लभ खनिजों का इस्तेमाल किसी भी स्थिति में भू-राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

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Ankit Yadav
14 सित 2026, 11:17
वैश्विक चेतावनी: प्रौद्योगिकी और दुर्लभ खनिजों को हथियार नहीं बनाना चाहिए: प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने संबोधन के दौरान दुनिया भर के देशों को एक स्पष्ट संदेश दिया है। उनका कहना है कि आधुनिक तकनीक और महत्वपूर्ण दुर्लभ खनिजों (रेयर अर्थ मिनरल्स) को भू-राजनीतिक हितों साधने के लिए या किसी के खिलाफ हथियार के रूप में बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इस तरह की प्रवृत्तियों से आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है और आपसी विश्वास कमजोर पड़ता है। भारत हमेशा से ही मुक्त और निष्पक्ष व्यापार का समर्थन करता आया है और यह बयान उसी दिशा में एक मजबूत पहल के रूप में देखा जा रहा है।

वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभाव

तकनीकी संसाधनों और कच्चे माल की उपलब्धता आज के दौर में किसी भी देश की आर्थिक वृद्धि के लिए रीढ़ की हड्डी समान है। जब कभी इन संसाधनों के व्यापार में राजनीतिक बाधाएं डाली जाती हैं या इन्हें नियंत्रित करने के लिए अनुचित दबाव बनाया जाता है, तब विकासशील और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। प्रधानमंत्री मोदी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब दुनिया भर की सप्लाई चेन विभिन्न भू-राजनीतिक तनावों और व्यापारिक प्रतिबंधों के दौर से गुजर रही है। विशेषकर उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों के औद्योगिक केंद्रों में आधुनिक तकनीकों की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिसके लिए सुरक्षित और अबाध आपूर्ति श्रृंखला बेहद आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल और औद्योगिक परिवर्तन की गति को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि सभी राष्ट्र मिलकर काम करें। तकनीक और दुर्लभ खनिजों पर किसी एक देश का एकाधिकार या उनका राजनीतिक इस्तेमाल पूरी मानवता के विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमेशा पारदर्शिता, सहयोग और साझा समृद्धि की वकालत की है। प्रधानमंत्री का यह दृष्टिकोण वैश्विक व्यापारिक साझेदारियों को अधिक मजबूत और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक मार्गदर्शक का काम कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के बयानों से वैश्विक स्तर पर एक सकारात्मक संवाद की शुरुआत होती है। देश और दुनिया के तमाम नीति-निर्माता अब इस बात पर विचार कर रहे हैं कि भविष्य की तकनीकी जरूरतों को सुरक्षित कैसे रखा जाए। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों में और अधिक स्पष्टता देखने को मिल सकती है, जिससे भारत जैसे देशों को अपनी तकनीकी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में आसानी होगी।
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