संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के आगामी सत्र से ठीक पहले विश्व संगठन के सर्वोच्च पद यानी महासचिव की भावी नियुक्ति को लेकर राजनयिक गलियारों में सरगर्मी बढ़ गई है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के आठ दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अब तक चुने गए सभी नौ महासचिव पुरुष ही रहे हैं। इस ऐतिहासिक विषमता को दूर करने के लिए विकासशील देशों, विशेष रूप से 'ग्लोबल साउथ' के सदस्य राष्ट्रों ने एकजुट होकर मांग उठाई है कि अगला महासचिव किसी महिला को बनाया जाना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक दबाव बना रहे कई सदस्य देशों का तर्क है कि वर्तमान में दुनिया जिस प्रकार की जलवायु चुनौतियों, क्षेत्रीय संघर्षों और आर्थिक असमानता का सामना कर रही है, उसमें संयुक्त राष्ट्र को एक अधिक समावेशी और संतुलित नेतृत्व की आवश्यकता है। महासभा की पूर्व भारतीय अध्यक्ष विजया लक्ष्मी पंडित का उल्लेख करते हुए कई महिला नेताओं ने कहा है कि विश्व निकाय में लैंगिक समानता केवल नीतियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि संगठन के शीर्ष स्तर पर भी दिखाई देनी चाहिए। लातिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के कई प्रमुख देशों ने इस प्रस्ताव का खुला समर्थन किया है।
सुरक्षा परिषद के स्थायी पांच सदस्यों (P5) के बीच इस मुद्दे पर पर्दे के पीछे बातचीत जारी है। यद्यपि अंतिम निर्णय में सुरक्षा परिषद की सहमति और महासभा का अनुमोदन आवश्यक होगा, लेकिन इस बार वैश्विक नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों का दबाव बहुत अधिक है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि ग्लोबल साउथ से किसी योग्य महिला उम्मीदवार के नाम पर सर्वसम्मति बनती है, तो यह बहुपक्षीय कूटनीति के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा और संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।