राजस्थान के कई जिलों में वर्षा की कमी और सिंचाई का संकट
सिरोही समेत राज्य के अनेक इलाकों में इस वर्ष पर्याप्त मानसूनी पानी नहीं बरसा है। इसका सीधा असर कृषि गतिविधियों पर पड़ा है और किसान पानी की भारी तंगी से जूझ रहे हैं। खेतों की सिंचाई के लिए जिन जलाशयों पर लोग निर्भर रहते थे, उनमें भी पानी की आवक बेहद कम दर्ज की गई है। इस वजह से अन्नदाताओं के सामने अपनी फसलों को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। पारंपरिक तरीकों से फसलों को सींचना अब संभव नहीं रहा क्योंकि भूमिगत जलस्तर और जलाशयों का स्तर नीचे चला गया है। ऐसी विषम परिस्थितियों के बीच कृषि विशेषज्ञों और प्रगतिशील किसानों ने आधुनिक तरीकों को अपनाने पर जोर दिया है। उनका मानना है कि यदि आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीकों का समझदारी से उपयोग किया जाए, तो न्यूनतम जल संसाधनों के माध्यम से भी खेतों में बंपर पैदावार ली जा सकती है। इससे न केवल पानी की बर्बादी रुकेगी बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी।
ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली के फायदे और लागत
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पौधों को पानी देने के लिए टपक सिंचाई या फव्वारा प्रणाली बेहद कारगर साबित हो रही है। प्रगतिशील किसान मोहनलाल डांगी के अनुसार टपक विधि में पाइप और छोटे नोजल की मदद से नमी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाई जाती है। इस प्रक्रिया से खेत में पानी अनावश्यक रूप से इधर-उधर नहीं फैलता और नमी बनी रहती है। इस विधि का उपयोग अनार, अमरूद जैसे फलदार पेड़ों के साथ-साथ टमाटर, मिर्च और अन्य सब्जियों की खेती में आसानी से किया जा सकता है। एक से पांच बीघा भूमि पर सब्जियों के लिए इस सेटअप को स्थापित करने का खर्च लगभग 25 हजार से 60 हजार रुपये के बीच आता है जो फसल की किस्म पर निर्भर करता है। इसके अलावा कई लोग फव्वारा विधि का भी इस्तेमाल कर रहे हैं जिसमें पौधों पर फव्वारे के जरिए पानी छिड़का जाता है हालांकि इसकी स्थापना पर आने वाला खर्च पहली विधि की तुलना में अधिक होता है। बेहतरीन परिणाम पाने के लिए इस पूरे तंत्र की सही डिजाइन, फिल्टर की नियमित सफाई और उचित रखरखाव बेहद आवश्यक माना गया है।
मल्चिंग तकनीक और कम पानी वाली फसलों का चयन
खेतों में नमी बनाए रखने और जल संरक्षण के लिए पलवार विधि एक अन्य शानदार और उपयोगी विकल्प है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया में पौधों के चारों ओर की मिट्टी को सूखे पत्तों, फसल कटाई के बचे अवशेषों या विशेष कृषि फिल्मों से ढंक दिया जाता है। कई मामलों में खेतों में विशेष प्रकार के कागज बिछाकर उसके बाद बुवाई का कार्य किया जाता है। इससे मिट्टी की सतह से पानी का वाष्प बनकर उड़ना बहुत हद तक कम हो जाता है जिससे लंबे समय तक नमी सुरक्षित रहती है। इस प्रक्रिया का एक और बड़ा फायदा यह होता है कि पौधों के समीप अनावश्यक घास-फूस या खरपतवार नहीं उग पाते हैं। विशेषकर बागवानी और सब्जी उत्पादन में यह तरीका किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रहा है। इसके साथ ही पानी की भारी किल्लत वाले स्थानों पर किसानों को कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें चुननी चाहिए। प्रदेश में बाजरा, ग्वार, मोठ और तिल जैसी फसलें ऐसी परिस्थितियों में उगाने के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती हैं जो प्रतिकूल मौसम में भी अच्छा उत्पादन देती हैं।