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बड़ा नीतिगत रुख: आगामी ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत ने स्पष्ट किया कि कोई साझा मुद्रा नहीं आएगी, बल्कि स्थानीय मुद्राओं और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया जाएगा

आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मद्देनजर भारत ने अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं को लेकर एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट दृष्टिकोण सामने रखा है, जिसके तहत किसी भी एकीकृत साझा मुद्रा की संभावना को खारिज करते हुए आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल और डिजिटल भुगतान प्रणालियों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया है।

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Ankit Yadav
06 सित 2026, 17:40
बड़ा नीतिगत रुख: आगामी ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत ने स्पष्ट किया कि कोई साझा मुद्रा नहीं आएगी, बल्कि स्थानीय मुद्राओं और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया जाएगा
आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले वैश्विक स्तर पर आर्थिक कूटनीति के मोर्चे पर भारत ने एक बेहद स्पष्ट और दूरदर्शी नीतिगत रुख अपनाया है। देश की तरफ से यह साफ कर दिया गया है कि समूह के भीतर किसी भी प्रकार की नई साझा 'ब्रिक्स करेंसी' को लाने की कोई योजना नहीं है। इस फैसले से उन अटकलों पर विराम लग गया है, जिनमें पिछले कुछ समय से यह चर्चा चल रही थी कि ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए एक साझा वैश्विक मुद्रा जारी कर सकते हैं। इसके बजाय, भारत का मुख्य फोकस सदस्य देशों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देने और उन्नत डिजिटल भुगतान व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर केंद्रित रहेगा।

स्थानीय मुद्राओं और डिजिटल भुगतान पर विशेष जोर

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम न केवल व्यावहारिक है बल्कि यह देश की आर्थिक प्राथमिकताओं के अनुकूल भी है। डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए साझा मुद्रा बनाने की जटिलताओं और चुनौतियों से पार पाने के बजाय, भारत का यह दृष्टिकोण सीधे तौर पर भारतीय रुपये और अन्य सहयोगी देशों की घरेलू मुद्राओं में व्यापारिक लेनदेन को सुगम बनाने पर काम करता है। इससे दुनिया के इस प्रभावशाली आर्थिक समूह के भीतर वित्तीय सहयोग अधिक लचीला और व्यावहारिक बनेगा। इसके अलावा, भारत अपनी अग्रणी डिजिटल भुगतान तकनीकों और फिनटेक पहलों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने के लिए भी पूरी तरह तैयार है, जिससे सीमा पार लेनदेन में लागत और समय दोनों की भारी बचत हो सकेगी। ब्रिक्स जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक मंच पर इस तरह का कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाना भारत की मजबूत होती आर्थिक कूटनीति का प्रमाण माना जा रहा है। पारंपरिक वित्तीय प्रणालियों में बदलाव लाने के जटिल प्रयासों में उलझने की बजाय, भारत ने उन माध्यमों को चुनने का फैसला किया है जो तुरंत परिणाम दे सकें और सदस्य देशों की संप्रभुता को भी सुरक्षित रखें। स्थानीय मुद्राओं में निपटान व्यवस्था से न केवल मुद्रा विनिमय के जोखिम कम होते हैं, बल्कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को वित्तीय स्थिरता भी मिलती है। आने वाले सम्मेलन में जब दुनिया भर के शीर्ष नेता और अर्थशास्त्री जुटेंगे, तो भारत का यह प्रस्ताव एक केंद्रीय विषय बन सकता है। डिजिटल इंडिया के तहत विकसित किए गए अत्याधुनिक भुगतान बुनियादी ढांचे को अन्य देशों के साथ साझा करने से एक नया वित्तीय नेटवर्क तैयार होने की उम्मीद है। सम्मेलन से पहले आए इस नीतिगत बयान ने यह साबित कर दिया है कि भारत वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को एक नई दिशा देने और व्यावहारिक आर्थिक साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।
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