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छात्र अर्थव्यवस्था का विस्तार: दिल्ली में बाहर से आने वाले छात्र हर साल खर्च करते हैं 45,000 करोड़ रुपये
देश की राजधानी दिल्ली में शिक्षा ग्रहण करने आने वाले बाहर के छात्र स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक बेहद मजबूत आधार दे रहे हैं। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, ये छात्र हर साल आवास, भोजन और अन्य प्राथमिक जरूरतों पर कुल मिलाकर 45,000 करोड़ रुपये खर्च करते हैं, जिससे पीजी और किराए के कमरों का बाजार काफी बड़ा हो चुका है।
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Ankit Yadav
10 सित 2026, 11:06
दिल्ली जैसे महानगर में देश के कोने-कोने से युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहुंचते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले ये छात्र यहां यूनिवर्सिटी, कॉलेज और विभिन्न कोचिंग संस्थानों में दाखिला लेते हैं। जब ये युवा अपने घरों से दूर आकर यहां बसते हैं, तो उनकी कई प्रकार की बुनियादी जरूरतें पैदा होती हैं। रहने के लिए पीजी यानी पेइंग गेस्ट आवास, किराए के फ्लैट, टिफिन सेवाएं और इंटरनेट जैसी सुविधाएं इस पूरी अर्थव्यवस्था के मुख्य स्तंभ बन चुके हैं। इन छात्रों की बदौलत राजधानी में एक समानांतर आर्थिक चक्र चल रहा है, जो स्थानीय निवासियों और छोटे कारोबारियों के लिए आय का एक बड़ा जरिया बन गया है।
पेइंग गेस्ट और किराए के बाजार का बढ़ता दायरा
दिल्ली के विभिन्न इलाकों में छात्रों की भारी मांग के कारण पीजी और हॉस्टल का कारोबार पिछले कुछ वर्षों में कई गुना बढ़ गया है। मुखर्जी नगर, ओल्ड राजेंद्र नगर, किंग्सवे कैंप, साकेत, और लक्ष्मी नगर जैसे प्रमुख शैक्षणिक हब में हर साल हजारों नए छात्र आते हैं। इन छात्रों के रहने और खाने की व्यवस्था करने के लिए स्थानीय संपत्ति मालिकों ने अपने घरों के बड़े हिस्सों को पीजी में बदल दिया है। इस व्यवसाय से न केवल मकान मालिकों को नियमित किराया मिलता है, बल्कि वार्डन, सफाई कर्मचारी, और खाना बनाने वाले रसोइयों के लिए भी रोजगार के हजारों अवसर पैदा होते हैं। अनुमान के मुताबिक, इस सेक्टर में होने वाला कुल वार्षिक खर्च अब 45,000 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर चुका है, जो यह साबित करता है कि छात्रों की यह आबादी देश की राजधानी की आर्थिकी में कितना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था और बाजार पर इस बड़े पैमाने के खर्च का गहरा असर साफ तौर पर देखा जा सकता है। किराना स्टोर, स्टेशनरी की दुकानें, फोटोकॉपी और प्रिंटिंग सेंटर, लॉन्ड्री सेवाएं और छोटे खान-पान के ढाबे मुख्य रूप से इन्हीं विद्यार्थियों के भरोसे चल रहे हैं। यदि इन छात्रों की उपस्थिति अचानक समाप्त हो जाए, तो इन छोटे और मध्यम स्तर के व्यवसायों को भारी वित्तीय घाटे का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, परिवहन सेवाओं जैसे कि ऑटो-रिक्शा, ई-रिक्शा और मेट्रो का नियमित उपयोग करने वाले यात्रियों में भी एक बड़ा हिस्सा इन्हीं छात्र-छात्राओं का होता है, जो रोजाना अपने कोचिंग या संस्थानों तक आने-जाने के लिए इन साधनों पर निर्भर रहते हैं।
आगामी चुनौतियां और भविष्य की संभावनाएं
हालांकि यह पीजी इकोनॉमी बहुत बड़ी है और इससे हजारों लोगों को आजीविका मिल रही है, लेकिन इसके सामने कई तरह की व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियां भी खड़ी हैं। महंगे किराए, सुरक्षा की कमी और बुनियादी सुविधाओं के आभाव जैसी समस्याएं अक्सर छात्रों और उनके अभिभावकों को परेशान करती हैं। कई बार बिना पंजीकरण के चल रहे पीजी और हॉस्टल मनमाना किराया वसूलते हैं, जिससे विद्यार्थियों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। सरकार और स्थानीय प्रशासन के स्तर पर इस अनियोजित बाजार को नियमित करने और छात्रों के लिए उचित किराए पर बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित करने की मांग लगातार उठाई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में दिल्ली की इस छात्र अर्थव्यवस्था का दायरा और अधिक विस्तृत होगा। जैसे-जैसे देश भर से आने वाले युवाओं की संख्या में इजाफा होगा, वैसे-वैसे इस क्षेत्र से जुड़े व्यवसाय भी नई ऊंचाइयों को छुएंगे। अगर प्रशासन इन पीजी और आवास प्रदाताओं के लिए कुछ पारदर्शी नियम और मानक तय कर दे, तो न सिर्फ छात्रों को राहत मिलेगी बल्कि इस विशाल अर्थव्यवस्था को एक और अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित दिशा भी प्राप्त हो सकेगी।