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रोजगार संकट: केंद्र सरकार में खाली पद दस साल में दोगुने होकर आठ लाख पार पहुंचे

देश में रोजगार के मोर्चे पर चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। पिछले एक दशक के भीतर केंद्र सरकार के विभागों में खाली पड़े पदों की संख्या दोगुनी हो गई है, जो अब बढ़कर 8.24 लाख से अधिक हो गई है। इसके साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और सरकारी कंपनियों में ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों का अनुपात भी काफी बढ़ गया है, जिससे स्थायी नौकरियों को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है.

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Ankit Yadav
23 अग 2026, 14:00
रोजगार संकट: केंद्र सरकार में खाली पद दस साल में दोगुने होकर आठ लाख पार पहुंचे
देश के भीतर बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों की स्थिति को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, बीते दस वर्षों के अंतराल में केंद्रीय मंत्रालयों तथा विभिन्न विभागों के अंतर्गत रिक्तियों के आंकड़े में भारी उछाल दर्ज किया गया है। कभी यह संख्या करीब 4.2 लाख हुआ करती थी, जो अब उछलकर 8.24 लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है। इस भारी वृद्धि ने युवाओं के बीच स्थायी सरकारी नौकरियों के अवसरों को लेकर गहरी निराशा पैदा कर दी है, क्योंकि एक तरफ जहां नौकरियों के लिए दावेदारों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ सिस्टम के भीतर स्वीकृत पदों का एक बड़ा हिस्सा खाली पड़ा हुआ है। इस प्रकार की स्थिति से प्रशासनिक कामकाज पर भी विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि मौजूदा कर्मचारियों पर काम का बोझ अत्यधिक बढ़ जाता है।

सरकारी कंपनियों में ठेका प्रथा का बढ़ता दायरा

इस बीच एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया है कि सरकारी उपक्रमों और सार्वजनिक क्षेत्र की विभिन्न व्यावसायिक कंपनियों में नियमित भर्तियों के बजाय संविदा या ठेके पर काम कराने का चलन तेजी से बढ़ा है। ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, वर्तमान समय में इन सरकारी संस्थानों के कुल कार्यबल का लगभग 49 प्रतिशत हिस्सा ठेके पर रखे गए कर्मचारियों का है। इसका सीधा अर्थ यह है कि लगभग आधे पदों पर काम करने वाले लोग उन सुविधाओं और सुरक्षा उपायों से वंचित हैं, जो एक नियमित सरकारी कर्मचारी को प्राप्त होती हैं। जानकारों का मानना है कि प्रशासनिक खर्चों में कटौती करने और प्रबंधन को अधिक लचीला बनाने के उद्देश्य से सरकारें और उपक्रम आउटसोर्सिंग का रास्ता अपना रहे हैं, लेकिन इसके कारण मेहनतकश युवाओं का भविष्य अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। सामाजिक सुरक्षा और भविष्य निधि जैसे लाभों के अभाव में संविदा कर्मियों का जीवन आर्थिक रूप से असुरक्षित बना रहता है। नौकरियों के इन आंकड़ों के सामने आने के बाद देश भर के विभिन्न राजनीतिक दलों और श्रमिक संगठनों ने अपनी तीखी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार जानबूझकर रिक्त पदों को नहीं भर रही है ताकि युवाओं को आरक्षण और नियमित वेतनमान के लाभ से वंचित रखा जा सके। दूसरी ओर, आर्थिक विश्लेषकों का यह भी तर्क है कि आधुनिक प्रशासनिक तंत्र में तकनीक के बढ़ते उपयोग के कारण पारंपरिक पदों की संख्या को तार्किक रूप से कम किया जा रहा है या फिर उन्हें अलग प्रारूप में बदला जा रहा है। हालांकि, जमीनी हकीकत यही है कि रोजगार की तलाश कर रहे लाखों प्रशिक्षित नौजवानों के लिए सरकारी क्षेत्र में अवसर लगातार सिमटते जा रहे हैं। आने वाले समय में यदि इन रिक्तियों को भरने के लिए कोई ठोस और पारदर्शी अभियान नहीं चलाया गया, तो यह मुद्दा देश की चुनावी राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को और अधिक प्रभावित कर सकता है, जिससे सरकार पर स्थायी रोजगार सृजित करने का भारी दबाव बनना तय माना जा रहा है।
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