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शिक्षा

कौशल विकास जरूरी: लखनऊ में तरनजीत सिंह संधू ने कहा कि केवल डिग्री से काम नहीं चलेगा

लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान तरनजीत सिंह संधू ने आज की बदलती हुई वैश्विक परिस्थितियों में केवल अकादमिक डिग्रियों पर निर्भर रहने के बजाय व्यावहारिक कौशल और क्षमताओं को विकसित करने पर विशेष जोर दिया।

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Ankit Yadav
18 सित 2026, 12:18
कौशल विकास जरूरी: लखनऊ में तरनजीत सिंह संधू ने कहा कि केवल डिग्री से काम नहीं चलेगा
शिक्षा और रोजगार के बदलते स्वरूप पर चर्चा करते हुए हाल ही में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है। इस संदर्भ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान वक्ता तरनजीत सिंह संधू ने अपने विचार साझा करते हुए इस बात पर प्रकाश डाला कि आधुनिक युग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए केवल पारंपरिक डिग्रियां हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है। उन्होंने आज के युवाओं और छात्रों से आह्वान किया कि वे अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव लाएं और अपने अंदर नए जमाने के कौशल को तेजी से विकसित करें।

बदलती दुनिया और रोजगार के नए आयाम

वर्तमान समय में तकनीक और उद्योग जगत में आ रहे तीव्र बदलावों के कारण कार्यस्थल की जरूरतें पूरी तरह से बदल चुकी हैं। पारंपरिक शिक्षा प्रणाली अक्सर केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित रह जाती है, जबकि आज के नियोक्ताओं को ऐसे युवाओं की तलाश होती है जो व्यावहारिक समस्याओं का समाधान कर सकें। इस बदलाव के मद्देनजर यह अनिवार्य हो गया है कि युवा वर्ग औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ अपनी स्किल मैपिंग पर भी पूरा ध्यान दे। संधू का यह संदेश इस बात की पुष्टि करता है कि आधुनिक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए कौशल उन्नयन सबसे महत्वपूर्ण हथियार है। शिक्षाविदों और विशेषज्ञों का भी मानना है कि देश के सबसे बड़े राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश और खासकर लखनऊ जैसे उभरते हुए शैक्षणिक हब में इस तरह की सोच युवाओं के भविष्य को एक नई दिशा दे सकती है। जब तक छात्र अपनी पठन-पाठन की शैली में व्यावहारिक प्रशिक्षण को शामिल नहीं करेंगे, तब तक उनके लिए वैश्विक स्तर पर रोजगार के नए अवसरों को भुनाना मुश्किल हो सकता है। इसलिए उच्च शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों को भी अपने पाठ्यक्रम में तकनीकी और व्यावहारिक प्रशिक्षण को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि छात्र बदलते दौर की चुनौतियों का डटकर सामना कर सकें।

युवाओं के लिए भविष्य की रूपरेखा

आने वाले दिनों में इस तरह के बयानों और चर्चाओं का असर शैक्षणिक संस्थानों की नीतियों पर भी देखने को मिल सकता है। उत्तर प्रदेश प्रशासन और स्थानीय शिक्षण संस्थान लगातार ऐसे प्रयास कर रहे हैं जिससे छात्रों की रोजगार पाने की क्षमता को बढ़ाया जा सके। लखनऊ में दिए गए इस संदेश ने एक बार फिर इस बहस को छेड़ दिया है कि देश की युवा शक्ति को सही दिशा देने के लिए डिग्री और कौशल के बीच एक बेहतर तालमेल बिठाना कितना जरूरी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि शिक्षण संस्थान इस दिशा में कितने प्रभावी कदम उठाते हैं।
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