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शिक्षा

परीक्षा प्रणाली में बदलाव: गोरखपुर विश्वविद्यालय विषम सेमेस्टर परीक्षाएं दो चरणों में कराएगा

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय और उसके सभी संबंद्ध महाविद्यालयों में विषम सेमेस्टर की आंतरिक परीक्षाएं अब दो भागों में संपन्न होंगी। परीक्षा समिति की हालिया बैठक में लिए गए इस निर्णय के बाद परीक्षा नियंत्रक ने आधिकारिक निर्देश जारी कर दिए हैं। सभी संस्थानों को तय समय सीमा के भीतर प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

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Ankit Yadav
16 अक्ट 2026, 11:02
परीक्षा प्रणाली में बदलाव: गोरखपुर विश्वविद्यालय विषम सेमेस्टर परीक्षाएं दो चरणों में कराएगा

परीक्षाओं का नया प्रारूप और चरण

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय और उससे जुड़े हुए तमाम महाविद्यालयों के सत्र 2026-27 के विषम सेमेस्टर की आंतरिक परीक्षाओं के आयोजन को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है। यह मूल्यांकन प्रक्रिया अब एक बार के बजाय दो चरणों में पूरी की जाएगी। परीक्षा समिति की महत्वपूर्ण बैठक में इस पर मुहर लगाई गई जिसके पश्चात परीक्षा नियंत्रक ने दिशा-निर्देश जारी किए। तय प्रावधानों के मुताबिक दोनों परीक्षाओं में से जिस भी परीक्षा में छात्र के सर्वाधिक अंक आएंगे उसे ही अंतिम आंतरिक मूल्यांकन के रूप में मान्यता दी जाएगी। यदि कोई परीक्षार्थी केवल एक ही परीक्षा में उपस्थित हो पाता है तो उसी के प्राप्त अंकों को वैध माना जाएगा। हालांकि इसके लिए महाविद्यालय के प्राचार्य या विभाग प्रमुख को अपने आधिकारिक लेटरहेड पर एक प्रमाणपत्र पोर्टल अथवा ईमेल के माध्यम से उपलब्ध कराना होगा। इन आंतरिक परीक्षाओं का स्वरूप पहले की भांति ही पूरी तरह वर्णनात्मक रहेगा और प्रत्येक परीक्षा के लिए कुल 25 अंक निर्धारित किए गए हैं। प्रथम चरण की परीक्षा को संपन्न करने के लिए 20 अक्तूबर तक की समय सीमा तय की गई है। वहीं दूसरी परीक्षा का आयोजन 23 नवंबर से पहले पूरा करना अनिवार्य किया गया है ताकि समय पर आगे की प्रक्रिया बढ़ाई जा सके।

अंक अपलोड करने की अंतिम तिथियां

शैक्षणिक संस्थानों के लिए विश्वविद्यालय ने अंकों की प्रविष्टि और परीक्षा रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने को लेकर कड़े नियम लागू किए हैं। आंतरिक और प्रायोगिक दोनों ही परीक्षाओं के प्राप्तांकों को आगामी 25 नवंबर तक आधिकारिक पोर्टल पर अनिवार्य रूप से अपलोड करना होगा। इस संदर्भ में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी परिस्थिति में इस अंतिम तिथि में कोई विस्तार नहीं किया जाएगा। यदि कोई भी महाविद्यालय 23 नवंबर तक प्रायोगिक परीक्षाएं संपन्न कराकर उनके अंक पोर्टल पर दर्ज नहीं करता है तो उसे इसके बाद परीक्षा आयोजित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ऐसे छूटे हुए विद्यार्थियों की प्रायोगिक परीक्षाएं सीधे विश्वविद्यालय परिसर में अथवा किसी अन्य निर्धारित महाविद्यालय में संपन्न कराने की प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा सभी संबंधित महाविद्यालयों और विभागों को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वे परीक्षा से जुड़े सभी प्रकार के अभिलेखों को कम से कम दो साल तक सुरक्षित संभाल कर रखें। प्रायोगिक परीक्षाओं के आयोजन के लिए 20 अक्तूबर से 23 नवंबर तक की अवधि निर्धारित की गई है। इन सभी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना सभी संबद्ध संस्थानों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है ताकि मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता पूरी तरह से बनी रहे।

मूल्यांकन की पारदर्शिता और नियम

छात्रों के मूल्यांकन में गुणवत्ता बनाए रखने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने उत्तर पुस्तिकाओं की जांच को लेकर विशेष निगरानी का प्रावधान किया है। निर्देश के मुताबिक यदि किसी छात्र को उसकी आंतरिक परीक्षा में निर्धारित अधिकतम अंकों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा दिया जाता है तो विश्वविद्यालय इस स्थिति में संबंधित विद्यार्थियों की उत्तर पुस्तिकाएं मंगवाकर उनकी जांच कर सकता है। इस नियम का उद्देश्य मूल्यांकन प्रक्रिया में एकरूपता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना है ताकि सभी छात्रों को न्यायसंगत अंक मिल सकें। परीक्षा नियंत्रक द्वारा जारी किए गए आदेशों में यह भी सुनिश्चित किया गया है कि छात्र दोनों चरणों की परीक्षाओं में हिस्सा लेकर अपने प्रदर्शन को बेहतर बना सकें क्योंकि दोनों में से सर्वोच्च अंक ही उनके अंतिम परिणाम का आधार बनेंगे। विश्वविद्यालय प्रशासन के इन कदमों से उच्च शिक्षा संस्थानों में शैक्षणिक सत्र की व्यवस्थाएं अधिक अनुशासित होंगी और समय पर परीक्षा परिणाम घोषित करने में मदद मिलेगी। सभी महाविद्यालयों के प्राचार्यों और विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया गया है कि वे इन सभी नियमों की समय सीमा का विशेष ध्यान रखें ताकि किसी भी स्तर पर विद्यार्थियों का शैक्षणिक नुकसान न हो और पूरी व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो सके।

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