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समग्र विकास की पहल: भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित पंचपदी अधिगम पद्धति से झा ने बताया बच्चों का भविष्य
भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित पंचपदी अधिगम पद्धति को बच्चों के समग्र और सर्वांगीण विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है, जिससे शिक्षा प्रणाली में नए आयाम जुड़ रहे हैं।
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Ankit Yadav
12 सित 2026, 12:46
शिक्षा के क्षेत्र में पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक नया कदम सामने आया है। हाल ही में शिक्षाविदों और विचारकों द्वारा यह रेखांकित किया गया है कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित पंचपदी अधिगम पद्धति बालकों के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस पद्धति के माध्यम से न केवल बच्चों की बौद्धिक क्षमता का विस्तार होता है, बल्कि उनके नैतिक, मानसिक और सामाजिक पहलुओं का भी संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सकता है। आधुनिक समय में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, ऐसे में प्राचीन भारतीय पद्धतियों को पुनर्जीवित करना और उन्हें समकालीन पाठ्यक्रम में शामिल करना एक दूरदर्शी कदम माना जा रहा है।
पंचपदी अधिगम पद्धति और उसके लाभ
शुरुआती दौर से ही बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में शिक्षा की पद्धति का बहुत बड़ा योगदान रहता है। पंचपदी अधिगम पद्धति पारंपरिक शिक्षण के उन मूलभूत सिद्धांतों पर टिकी है जो अनुभव आधारित शिक्षा को बढ़ावा देते हैं। इसमें छात्र केवलता किताबों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने आसपास के वातावरण, संस्कृति और जीवन मूल्यों से भी सीखते हैं। जानकारों का मानना है कि इस प्रकार की शिक्षण प्रणाली से विद्यार्थियों में तार्किक सोच, समस्या समाधान की क्षमता और रचनात्मकता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इस दृष्टिकोण से बच्चों को जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाता है, जो उनके भविष्य के निर्माण में एक मजबूत नींव का काम करता है।
पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को वर्तमान शैक्षणिक ढांचे में पिरोने से देश भर के विद्यालयों और संस्थानों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। लखनऊ सहित देश के विभिन्न हिस्सों में शैक्षणिक सत्रों के दौरान भारतीय संस्कृति और प्राचीन ज्ञान प्रणालियों पर आधारित चर्चाओं का दौर लगातार जारी है। शिक्षकों और अभिभावकों का भी यह मानना है कि यदि बच्चों को शुरुआत से ही हमारे अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक ज्ञान से जोड़ा जाए, तो उनका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। इस दिशा में नीति निर्माताओं और शिक्षण संस्थानों द्वारा विभिन्न कार्यशालाओं और कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, ताकि इस पद्धति के महत्व को जन-जन तक पहुंचाया जा सके और इसके व्यावहारिक प्रयोग को कक्षाओं में लागू किया जा सके।
आने वाले समय में इस बात की पूरी संभावना है कि इस तरह की अधिगम प्रणालियों को स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में और अधिक गहराई से जोड़ा जाएगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए केवल अंकों पर आधारित शिक्षा प्रणाली पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें एक बेहतर इंसान बनाने के लिए नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का समावेश करना भी उतना ही जरूरी है। पंचपदी पद्धति इसी आवश्यकता को पूरी तरह से संबोधित करती है और यही कारण है कि शिक्षा जगत में इसकी गूंज लगातार सुनाई दे रही है। इस पहल के दूरगामी परिणाम आने वाले वर्षों में भारतीय शिक्षा प्रणाली की रूपरेखा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।