सेंसेक्स और निफ्टी में बड़ी गिरावट
भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को कारोबार के दौरान लगातार दो कार्यदिवसों से जारी तेजी का सिलसिला थम गया। केंद्रीय बैंक द्वारा नीतिगत मोर्चे पर लिए गए कड़े निर्णयों के बाद बाजार के निवेशकों ने पूरी तरह से सतर्क रुख अपना लिया। बॉन्ड यील्ड में लगातार वृद्धि और कमजोर वैश्विक संकेतों ने भी घरेलू बाजार की स्थिति को प्रभावित किया। बंबई स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स चार सौ उन्नतीस दशमलव ग्यारह अंक यानी शून्य दशमलव पांच नौ प्रतिशत की कमजोरी के साथ बेहतरहत्तर हजार छह सौ अड़तीस दशमलव सात शून्य के स्तर पर बंद हुआ। इसके साथ ही नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी सूचकांक भी एक सौ तिहत्तर दशमलव शून्य पांच अंक यानी शून्य दशमलव सात छह प्रतिशत लुढ़ककर बाईस हजार छह सौ तीन दशमलव शून्य पांच पर आ गया। इससे पहले के दो सत्रों में दोनों प्रमुख सूचकांकों में अच्छी खासी बढ़त दर्ज की गई थी। बुधवार के कारोबार के दौरान सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी, वाहन और धातु क्षेत्रों के शेयरों पर बिकवाली का भारी दबाव स्पष्ट रूप से देखा गया। हालांकि बैंकिंग सेक्टर के कुछ प्रमुख शेयरों में अपेक्षाकृत स्थिरता देखने को मिली, जिससे बाजार को किसी और बड़ी गिरावट से बड़ी राहत मिल गई। निफ्टी के शेयरों में इंफोसिस, लार्सन एंड टुब्रो और एचडीएफसी बैंक में सबसे ज्यादा कमजोरी दर्ज की गई और वे प्रमुख नुकसान वाले शेयरों में शामिल रहे।
भारतीय रिजर्व बैंक का नीतिगत फैसला
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की पांच से सात अक्टूबर तक चली उच्चस्तरीय बैठक में एक बड़ा निर्णय लिया गया। समिति के सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से निर्णय लेते हुए नीतिगत रेपो दर में पच्चीस आधार अंकों की बढ़ोतरी कर दी, जिसके बाद यह दर बढ़कर पांच दशमलव पांच शून्य प्रतिशत हो गई है। इससे पहले यह दर पांच दशमलव दो पांच प्रतिशत पर स्थिर बनी हुई थी। लगभग तीन वर्ष के लंबे अंतराल के बाद केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों में इस प्रकार की बढ़ोतरी की है। बाजार के जानकारों को इस फैसले की उम्मीद पहले से थी, लेकिन मौद्रिक नीति के रुख को तटस्थ से बदलकर चरणबद्ध सख्ती की ओर ले जाने की घोषणा ने निवेशकों को अधिक सावधान कर दिया। केंद्रीय बैंक के इस कदम का स्पष्ट अर्थ है कि वह देश में बढ़ रहे महंगाई के दबाव को रोकने के लिए मौद्रिक परिस्थितियों को और अधिक कड़क बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। समीक्षा बैठक के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष दो हजार छब्बीस से सत्ताइस के लिए देश की आर्थिक वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर सात दशमलव एक प्रतिशत कर दिया है। इसके साथ ही महंगाई के मोर्चे पर भी अनुमान को बढ़ाकर पांच दशमलव दो प्रतिशत कर दिया गया है। मजबूत आर्थिक गतिविधियों के बीच महंगाई का बढ़ता हुआ जोखिम केंद्रीय बैंक के सामने एक लगातार बनी रहने वाली नीतिगत चुनौती है, जिसके कारण यह कड़ा कदम उठाया गया।
कच्चे तेल और वैश्विक बाजार का असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की चिंताओं को और अधिक बढ़ा दिया है। ब्रेंट क्रूड वायदा बढ़कर एक सौ एक दशमलव नौ तीन डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए कीमतों में तेजी से आयात बिल बढ़ने की पूरी आशंका है। अमेरिकी दस वर्षीय ट्रेजरी यील्ड बढ़कर पांच दशमलव तीन एक पांच प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि भारत में भी बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर सात दशमलव दो दो दो प्रतिशत हो गई। ऊंची बॉन्ड यील्ड को शेयर बाजार के लिहाज से हमेशा से प्रतिकूल माना जाता है क्योंकि इससे निवेशकों का रुझान सुरक्षित डेट इंस्ट्रूमेंट की तरफ अधिक हो जाता है। विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी कमजोर होकर छियानवे दशमलव सात आठ पांच शून्य के स्तर पर कारोबार करता रहा। इन तमाम वैश्विक और घरेलू कारकों के मिले-जुले असर से निवेशकों में सतर्कता का माहौल साफ दिखाई दिया और बाजार की चाल पर इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ा।