अपहरण के मामले में पुलिस की अंतिम जांच और सच्चाई अठारह महीने की मासूम बच्ची मीना से जुड़े इस पूरे प्रकरण का दायरा काफी संवेदनशील रहा है क्योंकि शुरुआत में परिवार और स्थानीय लोगों द्वारा अपहरण की आशंका जताई जा रही थी। पुलिस विभाग ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कई टीमों का गठन किया था जो लगातार सुराग जुटाने में लगी हुई थीं। जांच के दौरान जब आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली गई और वैज्ञानिक साक्ष्यों का मिलान किया गया, तो पूरी स्थिति धीरे-धीरे साफ होने लगी। अंततः पुलिस ने सभी तकनीकी पहलुओं और गवाहों के बयानों की समीक्षा करने के बाद अपहरण के इस दर्ज मुकदमे को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया है। अधिकारियों का यह स्पष्ट कहना है कि शुरुआती दौर में परिवार की घबराहट और अनभिज्ञता के कारण इसे अपहरण मान लिया गया था, परंतु जमीनी हकीकत और सबूतों की गहराई से हुई पड़ताल ने इस एंगल को पूरी तरह से नकार दिया है।
नाले में डूबने से हुई थी मौत, फॉरेंसिक रिपोर्ट से पुष्टि जांच एजेंसियों की ओर से दी गई आधिकारिक जानकारी के मुताबिक नन्हीं मीना के प्राण नाले के पानी में डूबने की वजह से छूटे थे। इस दुखद हादसे के सामने आने के बाद स्थानीय प्रशासन और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर भी कई तरह के सवाल खड़े होने स्वाभाविक हैं क्योंकि रिहायशी इलाकों के आसपास खुले नाले अक्सर ऐसे बड़े खतरों का कारण बनते हैं। फॉरेंसिक जांच और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में फेफड़ों में पानी जाने के स्पष्ट संकेत मिले थे, जिससे यह प्रमाणित हो गया कि घटना के पीछे किसी प्रकार की आपराधिक साजिश या फिरौती जैसी कोई बात नहीं थी। इस प्रकार के मामलों में आमतौर पर पुलिस सबसे पहले गुमशुदगी या अपहरण की धाराओं में ही मुकदमा दर्ज करती है ताकि हर संभावित कोण से जांच को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके। जैसे-जैसे फॉरेंसिक साक्ष्य, विसरा रिपोर्ट और चिकित्सीय परीक्षण के नतीजे सामने आते हैं, वैसे-वैसे मामले की असली तस्वीर जनता के सामने स्पष्ट होती जाती है और इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में भी ऐसा ही देखने को मिला है।
मामले के बंद होने के बाद परिवार और समाज की प्रतिक्रिया इस प्रकरण के पूरी तरह से बंद होने के बाद एक तरफ जहां पुलिस ने राहत की सांस ली है, वहीं दूसरी तरफ मासूम बच्ची को खोने वाले परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। इस तरह की दर्दनाक घटनाएं पूरे समाज को झकझोर कर रख देती हैं और अभिभावकों को अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर अधिक सतर्क रहने का कड़ा संदेश देती हैं। स्थानीय निवासियों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि खुले नालों और गड्ढों को लेकर प्रशासन को समय रहते सख्त कदम उठाने चाहिए ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को इस तरह के असहनीय दुखों का सामना न करना पड़े। मामले की फाइल बंद होने के साथ ही अब कानूनी प्रक्रिया का यह अध्याय समाप्त हो चुका है, किंतु इस अठारह महीने की बच्ची की असामयिक मृत्यु ने स्थानीय स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था और बुनियादी ढांचे के रखरखाव को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है।