उद्घाटन के तुरंत बाद गिरा मोतिहारी का पुल बिहार के मोतिहारी इलाके से एक चौंकाने वाली और बेहद गंभीर घटना सामने आई है जहाँ बुनियादी ढांचे की पोल पूरी तरह से खुल गई है। राज्य के प्रमुख नेता और मंत्री सम्राट चौधरी द्वारा जिस पुल का बड़े धूमधाम से उद्घाटन किया गया था, वह ढांचा अपनी ही दुर्बलता के चलते महज बीस दिन के भीतर अचानक धंस गया। इस प्रकार के महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों का इतनी जल्दी ढह जाना सीधे तौर पर निर्माण कार्य की गुणवत्ता और उसमें बरती गई भारी लापरवाही की ओर इशारा करता है। इस घटना के बाद से स्थानीय नागरिकों और आने-जाने वाले यात्रियों में अफरा-तफरी का माहौल बन गया है क्योंकि यह मार्ग रोजाना हजारों लोगों की आवाजाही का मुख्य जरिया हुआ करता था। गनीमत यह रही कि जिस समय यह संरचना धंसी, उस वक्त कोई बड़ा जानलेवा हादसा नहीं हुआ, वरना एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो सकता था। इस अप्रत्याशित घटना के सामने आने के बाद से पूरे इलाके में हड़कंप मचा हुआ है और आम जनता तथा विभिन्न राजनीतिक दलों के नुमाइंदे इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि आखिर करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाले ऐसे प्रोजेक्ट्स की जांच प्रक्रिया इतनी ढीली क्यों छोड़ी जाती है कि वे महीने भर भी नहीं टिक पाते।
बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता पर उठते गंभीर सवाल किसी भी राज्य में पुल और सड़कों जैसी आधारभूत संरचनाएं जनता के विकास और आवागमन को सुगम बनाने के लिए बनाई जाती हैं, लेकिन जब ऐसी परियोजनाएं उद्घाटन के कुछ ही हफ्तों के भीतर नेस्तनाबूद हो जाएं, तो पूरी व्यवस्था कटघरे में आ जाती है। बिहार के मोतिहारी में घटी इस दुर्घटना ने एक बार फिर से सरकारी महकमों, निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों की मिलीभगत पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। आम तौर पर इस तरह के प्रोजेक्ट्स के निर्माण के दौरान विभिन्न स्तरों पर तकनीकी जांच और गुणवत्ता नियंत्रण के कड़े दावे किए जाते हैं, परंतु धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है। समय-समय पर देखने को मिलता है कि उद्घाटन के शुरुआती दिनों में ही पुलों का धंसना या सड़कों का टूटना इस बात का प्रमाण है कि सरकारी धन का किस प्रकार दुरुपयोग किया जा रहा है और जनता के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ हो रहा है। इस प्रकार की घटनाओं से न केवल सरकार की छवि धूमिल होती है, बल्कि देश और दुनिया के सामने प्रदेश की प्रशासनिक कार्यप्रणाली भी असहज स्थिति में आ जाती है। स्थानीय बुद्धिजीवियों और विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ कड़ी और मिसालों जैसी कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाना पूरी तरह असंभव बना रहेगा।
राजनीतिक घमासान और उच्चस्तरीय जांच की मांग मोतिहारी में पुल धंसने की इस शर्मनाक घटना के सामने आने के बाद से सूबे की राजनीति में भूचाल आ गया है और विपक्षी दलों ने सरकार पर चौतरफा हमला बोल दिया है। विरोधी दलों के नेताओं का कहना है कि यह केवल एक पुल का टूटना नहीं है, बल्कि यह सरकारी भ्रष्टाचार का एक जीवंत दस्तावेज है जो यह साबित करता है कि विकास के तमाम दावे खोखले साबित हो रहे हैं। इस मामले के तूल पकड़ने के बाद अब यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग और शासन इस गंभीर लापरवाही पर क्या और किस प्रकार की सख्त कार्रवाई अमल में लाते हैं। स्थानीय जनता और पीड़ित लोग मांग कर रहे हैं कि इस पूरे मामले की एक निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच एजेंसी से तुरंत पड़ताल कराई जाए ताकि इसमें शामिल दोषी इंजीनियरों, अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय की जा सके। इसके अलावा, टूटे हुए हिस्से की जगह पर नए सिरे से मजबूत निर्माण कराने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सख्त नियम बनाने की मांग भी जोर पकड़ रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा विधानसभा से लेकर सड़क तक एक बड़ा राजनीतिक अस्त्र बन सकता है, जिससे सरकार की मुश्किलें और अधिक बढ़ सकती हैं।