जर्जर इमारतों में जान जोखिम डालकर रह रहे लोग उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहर लखनऊ के विभिन्न मोहल्लों में स्थिति अत्यंत चिंताजनक बनी हुई है जहाँ कई पुरानी और कमजोर हो चुकी इमारतें ढहने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। इसके बावजूद इन खतरनाक मकानों में तमाम परिवार अपनी जान हथेली पर रखकर रहने को मजबूर हैं। स्थानीय स्तर पर प्रशासन और नगर निगम के अधिकारियों को इन भवनों की बदहाल स्थिति की पूरी जानकारी है लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाया जा रहा है। हालात यह हैं कि कमजोर दीवारों और छतों वाले इन भवनों में रोजाना लोग अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर गुजर-बसर कर रहे हैं और किसी भी समय कोई बड़ा हादसा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। प्रशासनिक अमले की इस लचर कार्यशैली के कारण आम नागरिकों की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी गई है जबकि मानसून या भारी बारिश के दौरान ऐसे जर्जर मकानों के ढहने का खतरा कई गुना अधिक बढ़ जाता है।
महज कागजी नोटिस जारी कर औपचारिकता पूरी कर रहा विभाग शहरी इलाकों में असुरक्षित और जर्जर निर्माणों को चिन्हित कर उनके खिलाफ समय रहते उचित कार्रवाई करने की जिम्मेदारी स्थानीय विकास प्राधिकरणों और नगर निगम प्रशासन की होती है। सामान्य तौर पर ऐसे मामलों में अधिकारियों द्वारा खतरनाक भवनों के मालिकों या उसमें रहने वाले किरायेदारों को खाली करने के लिए नोटिस थमा दिए जाते हैं ताकि कागजों में जिम्मेदारी पूरी हो सके। हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि इन नोटिसों को जारी करने के बाद प्रशासन आगे की कोई वैधानिक या व्यावहारिक कार्रवाई करना भूल जाता है। न तो इन इमारतों को सील किया जाता है और न ही इनमें रहने वाले बेबस लोगों के वैकल्पिक आवास की कोई व्यवस्था की जाती है। इस प्रकार की प्रशासनिक उदासीनता के कारण लोग वहीं रहने को विवश रहते हैं क्योंकि उनके पास रहने के लिए कोई अन्य सुरक्षित ठिकाना नहीं होता है। विभागीय सुस्ती और खानापूरी करने की प्रवृत्ति के चलते नियमों का पालन केवल कागजों तक ही सिमट कर रह जाता है और वास्तविक सुरक्षा उपायों का घोर अभाव देखने को मिलता है।
किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा स्थानीय प्रशासन लखनऊ में बनी इस खतरनाक स्थिति को देखकर अब सवाल यह उठने लगा है कि क्या जिम्मेदार विभाग किसी बड़े और भीषण हादसे के घटित होने का इंतजार कर रहे हैं। जब तक कोई अप्रिय घटना नहीं घटती और जनहानि नहीं होती तब तक सरकारी अमले की नींद नहीं खुलती है और हादसे के बाद केवल जांच समितियों के गठन और मुआवजे की घोषणाओं की रस्म अदायगी शुरू होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते यदि इन जर्जर ढांचों को खाली नहीं कराया गया और सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने भी प्रशासन से मांग की है कि केवल कागजी नोटिस देने के बजाय इन अवैध और खतरनाक मकानों के खिलाफ तुरंत बुलडोजर कार्रवाई या इन्हें ढहाने की योजना पर अमल किया जाए। जनता की सुरक्षा के प्रति ऐसी लापरवाही न केवल प्रशासनिक तंत्र की विफलता को दर्शाती है बल्कि यह मानवीय जीवन के प्रति गहरी संवेदनहीनता का भी जीता-जागता उदाहरण पेश करती है।