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कम्युनिकेशन संकट: बाराबंकी में कंट्रोल रूम के फोन नहीं हो रहे रिसीव, उपभोक्ता परेशान

बाराबंकी जिले में नागरिक सेवाओं का बुरा हाल सामने आया है जहां आपातकालीन और सहायता नंबरों पर आने वाली कॉल्स का कोई जवाब नहीं मिल रहा है। बिजली, पानी और अन्य बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे आम नागरिक मदद पाने के लिए हेल्पलाइन नंबरों पर संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उन्हें केवल निराशा हाथ लग रही है। इस लचर व्यवस्था के कारण जनता का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है और संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।

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Ankit Yadav
20 सित 2026, 18:05
कम्युनिकेशन संकट: बाराबंकी में कंट्रोल रूम के फोन नहीं हो रहे रिसीव, उपभोक्ता परेशान

नियंत्रण कक्ष की लापरवाही से बढ़ी परेशानी स्थानीय स्तर पर स्थापित किए गए मुख्य नियंत्रण कक्ष के टेलीफोन लगातार बजने के बावजूद किसी भी कर्मचारी द्वारा उठाए नहीं जा रहे हैं जिससे आम जनता अपनी गंभीर शिकायतों को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने में पूरी तरह असमर्थ साबित हो रही है। इस प्रकार की तकनीकी और मानवाधिक लापरवाही उस समय सामने आई है जब उपभोक्ताओं को किसी न किसी प्रकार की आकस्मिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और वे त्वरित सहायता की उम्मीद में इन नंबरों को बार-बार डायल कर रहे हैं। दूरभाष यंत्रों के दूसरी तरफ से कोई भी उत्तर न मिलने के कारण लोग पूरी तरह अंधेरे में हैं कि वे अपनी समस्या का समाधान पाने के लिए आखिर किस अधिकारी या दफ्तर का रुख करें। इस व्यवस्था के सुचारू रूप से संचालित न होने के कारण पूरे इलाके के उपभोक्ताओं में भारी रोष व्याप्त है और लोग खुलेआम प्रशासनिक उदासीनता की आलोचना कर रहे हैं।

सरकारी सेवाओं में संपर्क की बुनियादी समस्याएं जनता और शासन के बीच सीधा संवाद स्थापित करने के लिए बनाए जाने वाले ये कंट्रोल रूम दरअसल संकट के समय आम आदमी का एकमात्र सहारा होते हैं और इनके फेल होने का सीधा मतलब प्रशासनिक तंत्र का चरमराना माना जाता है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में नागरिकों की समस्याओं के त्वरित निस्तारण के दावे अक्सर बड़े स्तर पर किए जाते हैं परंतु धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है जहां बुनियादी संचार माध्यम भी ठीक प्रकार से कार्य नहीं करते हैं। कर्मचारियों की गैर-मौजूदगी या उनकी सुस्ती के कारण जब इस प्रकार के हेल्पलाइन नंबर ठप पड़ जाते हैं तो आम नागरिकों का शासनतंत्र से विश्वास उठने लगता है और वे खुद को पूरी तरह असहाय महसूस करने लगते हैं। इस प्रकार की प्रशासनिक चूक के पीछे आमतौर पर नियमित निगरानी की कमी और कर्मचारियों की जवाबदेही तय न होना मुख्य कारण माना जाता है जिस पर उच्चाधिकारियों को कड़ा संज्ञान लेने की आवश्यकता होती है ताकि भविष्य में जनता को ऐसी दिक्कतों का सामना न करना पड़े।

जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल इस ताजा घटनाक्रम के बाद अब यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन इस गंभीर मामले पर क्या कदम उठाता है और लापरवाह कर्मियों के खिलाफ किस प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाती है। उपभोक्ताओं ने मांग की है कि फोन लाइनों की तुरंत जांच कराई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में किसी भी नागरिक की कॉल को नजरअंदाज न किया जाए ताकि संकट के समय त्वरित मदद मिल सके। यदि इस तरह की व्यवस्था में समय रहते सुधार नहीं किया गया तो स्थानीय निवासियों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए जा सकते हैं और मामले की शिकायत उच्च स्तर पर शासन तक पहुंचाई जा सकती है। प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे जनता की शिकायतों को गंभीरता से लें और व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए तुरंत आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करें।

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