सीसीएसयू परिसर में आयोजित हुआ विशेष मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर के भीतर हाल ही में मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या की रोकथाम विषय पर एक महत्वपूर्ण जागरूकता सत्र का आयोजन संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं और विशेषज्ञों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आधुनिक जीवनशैली के कारण छात्र-छात्राओं में तनाव लगातार बढ़ रहा है जिसे समय रहते पहचानना बेहद आवश्यक है। सत्र में उपस्थित विद्यार्थियों को समझाया गया कि यदि वे किसी भी प्रकार की मानसिक उलझन या अवसाद का सामना कर रहे हैं तो उन्हें अपनी भावनाओं को अपने करीबियों, मित्रों या योग्य परामर्शदाताओं के साथ तुरंत साझा करना चाहिए। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य युवाओं को यह अहसास कराना था कि जीवन में आने वाली हर समस्या का समाधान बातचीत के माध्यम से संभव है और किसी भी कठिन परिस्थिति में अकेलापन महसूस करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
शैक्षणिक संस्थानों में मानसिक तनाव और परामर्श की बढ़ती प्रासंगिकता आज के दौर में उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले युवाओं के बीच अकादमिक प्रदर्शन का दबाव, भविष्य की अनिश्चितता और व्यक्तिगत जीवन की चुनौतियां मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही हैं। इसी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय स्तर पर इस तरह के जागरूकता अभियानों का आयोजन अत्यंत प्रासंगिक माना जाता है ताकि छात्र बिना किसी झिझक के अपनी बात कह सकें। अमूमन ऐसे सत्रों में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया जाता है कि मानसिक बीमारियां या अत्यधिक तनाव किसी भी अन्य शारीरिक बीमारी की तरह ही सामान्य हैं और समय पर चिकित्सीय अथवा मनोवैज्ञानिक सहायता लेने से इनसे पूरी तरह निपटा जा सकता है। समाज और परिवारों में भी यह जागरूकता फैलानी जरूरी है कि युवाओं पर पढ़ाई या करियर को लेकर अत्यधिक दबाव न बनाया जाए, बल्कि उन्हें एक खुला और सकारात्मक वातावरण प्रदान किया जाए जहां वे अपनी असफलताओं और सफलताओं दोनों को खुलकर साझा कर सकें।
छात्रों के बीच सकारात्मक संवाद और भविष्य की कार्ययोजना का प्रभाव इस जागरूकता सत्र के बाद विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के बीच मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक सकारात्मक चर्चा शुरू हो गई है और आने वाले दिनों में ऐसे कई और शिविर आयोजित किए जाने की संभावना है। शिक्षण संस्थानों में इस तरह के आयोजनों से न केवल विद्यार्थियों में आत्महत्या जैसी गंभीर प्रवृत्ति के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है, बल्कि एक ऐसा मददगार समूह भी तैयार होता है जो संकट में फंसे अपने सहपाठियों की पहचान कर उनकी सहायता कर सकता है। अधिकारियों और शिक्षकों का मानना है कि यदि युवा समय रहते अपनी मानसिक परेशानियों को खुलकर व्यक्त करना सीख जाएं, तो कई अनमोल जिंदगियों को बचाया जा सकता है। भविष्य में इस प्रकार के कार्यक्रमों को पाठ्यक्रम या नियमित सह-शैक्षणिक गतिविधियों का हिस्सा बनाने पर भी विचार किया जा रहा है ताकि हर विद्यार्थी मानसिक रूप से मजबूत और संतुलित बन सके।