कंटाप
NEWS
गुरुवार, 22 अक्तूबर 2026
Follow Us
ब्रेकिंग
मुझे गालियां पड़ेंगी, लेकिन...; योगेंद्र यादव ने कहा- अभी मोदी का इस्तीफा नहीं चाहते लोग      Rain Alert: बन गया है कम दबाव का क्षेत्र, इन राज्यों में होने जा रही मूसलाधार बारिश, आंधी तूफान का भी अलर्ट      Tiger Shroff Attack Case में बड़ा खुलासा, वारदात से पहले शूटरों ने की थी बंदूक चलाने की प्रैक्टिस, हुआ था म      अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का जामनगर जाना क्या भारत की अहमियत बताता है?      ट्रंप के मुस्लिम शहर वाले बयान पर भड़के मैक्रों, कहा- मूर्खतापूर्ण...      अमित शाह के ‘चिट्टा रावण’ दहन ने 2016 की यादें की ताजा, जब रवनीत बिट्टू की लीडरशिप में कांग्रेस ने BJP-SAD सरकार के खिलाफ बनाया था माहौल      PM बोले-कुछ लोग विदेशों में भारत को बदनाम कर रहे: कांग्रेस कब तक अपने फेल प्रोडक्ट की लॉन्चिंग के लिए देश क...      रेहान वाड्रा की प्रदर्शनी से तस्वीरें हटाने पर बीकानेर हाउस का ये जवाब, प्रियंका गांधी ने कहा- तुम पर गर्व है     
SENSEX लोड हो रहा... | NIFTY लोड हो रहा... | GOLD (10g) ₹— | SILVER (10g) ₹— | USD/INR ₹— | CRUDE OIL $— | Uttar Pradesh — लोड हो रहा है | --:--:-- | लाइव अपडेट
@NewsKantap:
राजनीति

अनोखा विवाद: जानिए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष को किन मामलों में मिलती है विशेष छूट

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष के अधिकारों और विशेषाधिकारों को लेकर अक्सर चर्चाएं होती रहती हैं। हाल ही में यह सवाल सामने आया है कि इस पद पर आसीन छात्र नेता को किन शैक्षणिक और प्रशासनिक मामलों में छूट प्राप्त होती है।

A
Ankit Yadav
21 सित 2026, 16:22
अनोखा विवाद: जानिए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष को किन मामलों में मिलती है विशेष छूट

छात्रसंघ अध्यक्ष के विशेषाधिकारों पर उठ रहे बड़े सवाल दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी डूसू का चुनाव भारतीय राजनीति की नर्सरी माना जाता है और यहां जीत हासिल करने वाले उम्मीदवारों को कैंपस में व्यापक स्तर पर पहचान मिलती है। हाल ही में एक नया सवाल राजनीतिक गलियारों और छात्र संगठनों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है कि इस प्रतिष्ठित पद की जिम्मेदारी संभालने वाले छात्रसंघ अध्यक्ष को विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से क्या विशेष रियायतें दी जाती हैं। अमूमन यह देखा गया है कि आम छात्रों के लिए कॉलेज और विभागों में कक्षाओं की उपस्थिति यानी अटेंडेंस का नियम बेहद कड़क होता है और न्यूनतम प्रतिशत पूरा न होने पर परीक्षाओं से वंचित तक कर दिया जाता है। इसके अलावा छात्र नेताओं को मिलने वाले भत्तों और वित्तीय लाभों को लेकर भी लोगों में भारी जिज्ञासा बनी रहती है कि क्या उन्हें किसी प्रकार का मानदेय या वेतन दिया जाता है। इन सभी बिंदुओं पर जब गहराई से पड़ताल की जाती है तो कई दिलचस्प प्रशासनिक नियम सामने आते हैं जो सामान्य विद्यार्थियों और छात्र संघ के पदाधिकारियों के बीच की रूपरेखा को स्पष्ट करते हैं।

शैक्षणिक और प्रशासनिक नियमों की पेचीदगियां देश के इस सबसे बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव जीतना किसी बड़े राजनीतिक दंगल को जीतने जैसा होता है और इसके बाद विजेता छात्र नेता पर पूरे वर्ष भर छात्रों के हितों की रक्षा करने का भारी दबाव रहता है। अध्यक्ष पद पर बैठने वाले विद्यार्थी को अक्सर विश्वविद्यालय के विभिन्न प्रशासनिक चक्कर काटने होते हैं, धरना प्रदर्शनों में हिस्सा लेना पड़ता है और यूनिवर्सिटी के अलग-अलग कॉलेजों का दौरा करना पड़ता है। इसी व्यस्त दिनचर्या और आधिकारिक जिम्मेदारियों के कारण उनकी नियमित कक्षाओं में उपस्थिति कम हो जाती है, जिसके संबंध में विश्वविद्यालय के आंतरिक नियमों के तहत कुछ वैधानिक या व्यावहारिक प्रावधानों पर विचार किया जाता है ताकि वे अपनी पढ़ाई और राजनीतिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बना सकें। हालांकि इसका यह कतई मतलब नहीं है कि उन्हें बिना परीक्षा दिए डिग्री मिल जाती है या उनके सभी नियम पूरी तरह से माफ कर दिए जाते हैं, बल्कि उन्हें केवल उन आधिकारिक कार्यों के एवज में कुछ रियायतें मिलती हैं जो वे छात्रहित में विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ बैठकों के दौरान करते हैं। इसके बावजूद इन विशेषाधिकारों की सीमा तय करने को लेकर समय-समय पर छात्र संगठनों और आम विद्यार्थियों के बीच बहस छिड़ती रहती है कि क्या छात्र नेताओं को सामान्य छात्रों की तुलना में किसी भी प्रकार का अनुचित लाभ मिलना चाहिए या नहीं।

भविष्य की राजनीति और छात्र कल्याण पर पड़ने वाला असर डूसू अध्यक्ष का यह पूरा मामला केवल कुछ रियायतों तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरे छात्र राजनीतिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है जो आने वाले समय में विश्वविद्यालय के चुनावी सुधारों को प्रभावित कर सकता है। जब छात्र नेता अपनी कक्षाओं से लगातार अनुपस्थित रहकर सिर्फ राजनीतिक गतिविधियों और प्रशासनिक वार्ताओं में व्यस्त रहते हैं, तो इसका असर उनकी अपनी अकादमिक प्रगति के साथ-साथ आम छात्रों के विश्वास पर भी पड़ता है जो उन्हें चुनकर इस सर्वोच्च पद पर भेजते हैं। आने वाले दिनों में यह उम्मीद की जा रही है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र कल्याण विभाग इन विशेषाधिकारों को और अधिक पारदर्शी बनाएगा ताकि किसी भी प्रकार की भ्रम की स्थिति न उत्पन्न हो और छात्र नेता अपनी पढ़ाई तथा जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी ईमानदारी के साथ कर सकें। विभिन्न छात्र संगठन भी अब इस बात की मांग कर रहे हैं कि चुनावी सुधारों के तहत इन भत्तों, उपस्थिति नियमों और अन्य छूटों की एक स्पष्ट नियमावली सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि आम छात्रों को यह पता चल सके कि उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि किस अधिकार क्षेत्र के तहत कार्य कर रहे हैं और विश्वविद्यालय के नियम उन पर किस प्रकार लागू होते हैं।

कंटाप
NEWS
होम 🇮🇳 देश 🗺️ राज्य 🌍 विदेश 🏛️ राजनीति 💼 व्यापार 🏏 खेल 🎬 मनोरंजन 💻 टेक्नोलॉजी 🏥 स्वास्थ्य 📚 शिक्षा 🕉️ धर्म वीडियो राशिफल खोज