संसद के उच्च और निम्न दोनों सदनों में आज एक दुर्लभ राजनीतिक सहमति देखने को मिली जब सभी दलों ने उठकर और मेज थपथपाकर महिला आरक्षण विधेयक के विस्तृत नियमों का समर्थन किया। केंद्रीय कानून मंत्री द्वारा सदन में प्रस्तुत किए गए इन नियमों में यह स्पष्ट किया गया है कि आगामी विधानसभा चुनावों और उसके बाद के लोकसभा चुनावों में किस प्रकार एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। पिछले साल इस कानून के पारित होने के बाद से ही इसके क्रियान्वयन की नियमावली का इंतजार किया जा रहा था। आज संसद द्वारा इन नियमों पर मुहर लगाने के बाद अब चुनाव आयोग को जमीनी स्तर पर परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करने का कानूनी अधिकार मिल गया है।
विपक्ष और सत्ता पक्ष की ऐतिहासिक एकजुटता संसद की इस कार्यवाही के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक के बजाय राष्ट्र निर्माण और महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर अभूतपूर्व एकता दिखाई दी। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, सपा और डीएमके समेत तमाम विपक्षी दलों ने नियमों का समर्थन करते हुए मांग की कि इस प्रक्रिया में समाज के पिछड़े और वंचित वर्गों की महिलाओं को भी उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। महिला सांसदों ने इस ऐतिहासिक पल का स्वागत करते हुए कहा कि यह कानून भारतीय लोकतंत्र की तस्वीर को हमेशा के लिए बदल देगा और नीति निर्माण में महिलाओं की सीधी आवाज को बुलंद करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस अवसर पर संसद में अपने संबोधन में सभी दलों का आभार व्यक्त किया और इसे लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण बताया।
जमीनी स्तर पर राजनीतिक समीकरणों में भारी बदलाव की संभावना इस नए आरक्षण कानून के लागू होने से देश की राजनीति में जमीन पर बड़े पैमाने पर फेरबदल होना तय माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होने से पारंपरिक राजनीतिक दलों को अपने टिकट वितरण के फार्मूले में भारी बदलाव करना पड़ेगा। कई मौजूदा सांसदों और विधायकों की सीटें इस आरक्षण के दायरे में आ सकती हैं, जिससे नए और युवा चेहरों, विशेषकर महिला नेतृत्व को आगे आने का सुनहरा अवसर मिलेगा। चुनाव आयोग ने संकेत दिए हैं कि वह सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठक करके जल्द ही मतदाता सूची और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन की रूपरेखा सार्वजनिक करेगा।