रांची में कार्यसमिति की बैठक का आयोजन
झारखंड भारतीय जनता पार्टी की तरफ से रांची में चौबीस और पच्चीस अक्टूबर को प्रदेश कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक तय की गई है। इस कार्यक्रम को लेकर संगठन के सभी नेता और कार्यकर्ता काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं। इसी सिलसिले में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन तेईस अक्टूबर को ही रांची की धरती पर पहुंच चुके हैं। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए उनके इस दौरे और कार्यसमिति बैठक में शामिल होने के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। पार्टी के भीतर और बाहर इस बात की चर्चा है कि इस उच्च स्तरीय बैठक के जरिए संगठन को किस प्रकार नई दिशा दी जाएगी। राज्य के विभिन्न जिलों से आने वाले प्रतिनिधि इस सम्मेलन में हिस्सा लेंगे और सांगठनिक रणनीतियों पर खुलकर विचार-विमर्श करेंगे।
संगठन में हालिया बदलाव और नए चेहरों की तैनाती
राष्ट्रीय अध्यक्ष के रांची आगमन से ठीक पहले झारखंड बीजेपी संगठन में कई महत्वपूर्ण फेरबदल किए गए हैं। छत्तीसगढ़ से ताल्लुक रखने वाले पवन साय ने दो अक्टूबर को नए संगठन महामंत्री के रूप में अपना कार्यभार संभाल लिया है। उन्होंने कर्मवीर सिंह का स्थान लिया है, जिन्हें संगठन महामंत्री बनाकर छत्तीसगढ़ भेजा जा चुका है। पवन साय के कार्यभार संभालने के पांचवें दिन यानी पांच अक्टूबर को नए प्रदेश प्रभारी गजेंद्र पटेल भी रांची के दौरे पर पहुंचे। उनके साथ नए सह प्रभारी निवेदिता सिंह और सौरभ सिंह ने भी राज्य का दौरा किया। इसके अलावा राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री सौदान सिंह ने भी बीस से बाईस अक्टूबर तक झारखंड का दौरा किया था। इन तमाम नियुक्तियों और दौरों के बाद पार्टी के भीतर नए सिरे से बैठकों का दौर शुरू हुआ है। पवन साय और गजेंद्र पटेल दोनों ही आदिवासी समुदाय से आते हैं और पार्टी नेतृत्व ने इन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। मध्य प्रदेश की खरगोन सीट से सांसद गजेंद्र पटेल को प्रभारी और छत्तीसगढ़ के अनुभवी नेता पवन साय को संगठन महामंत्री बनाया गया है। इन दोनों नेताओं ने रांची पहुंचते ही स्थानीय पदाधिकारियों के साथ कई बैठकें की हैं और संगठन को धार देने के लिए जरूरी मंत्र भी साझा किए हैं।
खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कवायद
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की इन तमाम कवायदों के पीछे झारखंड में खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने की गहरी कसक जुड़ी हुई है। वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सैंतीस सीटों पर जीत दर्ज कर सत्ता हासिल की थी, लेकिन 2019 के चुनावों में यह संख्या घटकर चौबीस सीटों पर सिमट गई। इसके विपरीत झारखंड मुक्ति मोर्चा ने 2019 में तीस सीटों पर कब्जा जमाया और कांग्रेस तथा अन्य दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई। आदिवासियों के लिए आरक्षित अट्ठाइस सीटों में से 2019 के चुनाव में भाजपा को मात्र दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में यह संख्या और घटकर केवल एक सीट रह गई, जहां सरायकेला से चंपाई सोरेन विजयी हुए। यहां तक कि 2024 के लोकसभा चुनावों में भी आदिवासियों के लिए आरक्षित सभी पांचों सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। दूसरी तरफ जेएमएम गठबंधन ने छप्पन सीटें हासिल कीं और बयालीस प्रतिशत से अधिक वोट शेयर प्राप्त किया। हेमंत सोरेन के बढ़ते राजनीतिक कद और मजबूत आदिवासी समर्थन के सामने भाजपा के रणनीतिकार अब संगठन की कमजोर कड़ियों को कसने में जुटे हैं।