इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सरकार और संबंधित प्रशासनिक तंत्र की ओर से यह निर्देश जारी किए गए कि देश के प्रधानमंत्री के जन्मदिन के उपलक्ष्य में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएं और शिक्षण संस्थानों में दीये जलाए जाएं। इस प्रकार के प्रशासनिक फरमानों के सामने आने के बाद विभिन्न सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और नागरिक अधिकार समूहों में असंतोष की लहर दौड़ गई। आलोचकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का यह मानना है कि स्कूल और कॉलेज जैसे संस्थान ज्ञान, अनुसंधान और वैचारिक स्वतंत्रता के केंद्र होते हैं, न कि किसी राजनीतिक व्यक्ति विशेष की विचारधारा या जन्मदिन के उत्सव के प्रचार-प्रसार के मंच। जब प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग करके इस तरह के आयोजनों को अनिवार्य या आधिकारिक रूप से बढ़ावा दिया जाता है, तो यह शिक्षा के क्षेत्र में तटस्थता के बुनियादी सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन बन जाता है।
इस मामले में सबसे मुखर विरोध पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबरिटीज यानी पीयूसीएल की ओर से देखने को मिला है। संगठन ने सार्वजनिक रूप से बयान जारी करते हुए इस प्रकार के फरमानों को गैर-जरूरी और अनुचित करार दिया है। पीयूसीएल का तर्क है कि शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र और युवा देश का भविष्य हैं और उन्हें इस तरह की राजनीतिक गतिविधियों में झोंकना उनकी स्वतंत्र वैचारिक वृद्धि के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। अतीत में भी कई बार शिक्षण संस्थानों में राजनीतिक हस्तियों के जन्मदिन या अन्य राजनीतिक अभियानों को लेकर विवाद उत्पन्न होते रहे हैं, लेकिन इस बार सरकारी आदेश के रूप में निर्देश आने से यह मामला और भी अधिक गंभीर हो गया है। नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन को शिक्षा के भगवाकरण या राजनीतिकरण से बचना चाहिए और शैक्षणिक परिसरों को केवल शैक्षणिक गतिविधियों तक ही सीमित रखना चाहिए, ताकि वहां पढ़ने वाले हर छात्र को बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपने बौद्धिक विकास का पूरा अवसर मिल सके।
इस घटनाक्रम के तूल पकड़ने के बाद आने वाले दिनों में राजनीतिक गलियारों और शैक्षणिक हलकों में इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। एक तरफ जहां सरकार समर्थकों का तर्क है कि ऐसे आयोजन नागरिकों में राष्ट्रीयता और उत्सव की भावना को बढ़ावा देते हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल और नागरिक समाज इस मुद्दे को लेकर आक्रामक रुख अपनाने की तैयारी कर रहे हैं। इस विवाद के कारण आने वाले समय में यह बहस और तेज होने की संभावना है कि क्या शिक्षण संस्थानों को आधिकारिक तौर पर ऐसे आयोजनों का हिस्सा बनना चाहिए या फिर उन्हें पूरी तरह से राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखा जाना चाहिए। शिक्षाविदों का एक बड़ा वर्ग भी इस बात पर जोर दे रहा है कि यदि इस तरह की प्रवृत्तियों पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में शिक्षण संस्थानों का माहौल और अधिक राजनीतिकरण की भेंट चढ़ सकता है, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है।