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सांस्कृतिक ताकत: संगीत भारत की विविधता और साझा भावना को दर्शाता है- उपराष्ट्रपति
देश के उपराष्ट्रपति ने एक हालिया कार्यक्रम के दौरान भारतीय संगीत की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यहां की संगीत परंपरा देश की विविधता और सामूहिक एकता का प्रतीक है।
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Ankit Yadav
22 अग 2026, 11:40
भारतीय संस्कृति और धरोहर हमेशा से पूरी दुनिया में अपनी अनूठी पहचान रखती रही है। इसी कड़ी में देश के उपराष्ट्रपति ने संगीत को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि हमारी संगीत पद्धतियां किस प्रकार देश के कोने-कोने में फैली विभिन्न संस्कृतियों को एक सूत्र में पिरोती हैं। संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी गहरी सांस्कृतिक जड़ों का जीवंत दस्तावेज है जो समय की सीमाओं से परे जाकर लोगों को जोड़ने का काम करता है।
संगीत का सांस्कृतिक महत्व
देश की राजधानी और अन्य सांस्कृतिक मंचों पर अक्सर इस प्रकार के विचार रखे जाते हैं, जहां भारतीय कला और संगीत के प्रभाव पर खुलकर चर्चा होती है। उपराष्ट्रपति का यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक कलाओं को सहेजना और उनके मूल स्वरूप को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विभिन्न राज्यों की लोक धुनें, शास्त्रीय संगीत की अनगिनत शैलियां और संतों द्वारा रचे गए भजन-कीर्तन इस देश की बहुरंगी संस्कृति के जीवंत प्रमाण हैं। जब कोई कलाकार मंच पर अपनी प्रस्तुति देता है, तो वह केवल सुरों को नहीं साधता, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं को जीवंत कर रहा होता है।
विभिन्न राज्यों और भाषाओं के बावजूद, धुन और ताल की भाषा हर भारतीय को आसानी से समझ आती है। दक्षिण के कर्नाटक संगीत से लेकर उत्तर की हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत शैली तक, हर एक रूप में हमारी साझी संस्कृति की महक साफ महसूस की जा सकती है। इसके अलावा, लोक संगीत जैसे बाउल, पंडवानी, भांगड़ा या गरबा हमारे सामाजिक जीवन के उल्लास और संघर्षों की दास्तां बयां करते हैं। जब ये सभी शैलियां एक मंच पर आती हैं, तो देश की विविधता में एकता का वास्तविक दर्शन होता है, जिसका उल्लेख अक्सर देश के शीर्ष नेता अपने भाषणों में करते रहते हैं।
भविष्य की दिशा और संरक्षण
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाली पीढ़ियों के बीच इन शास्त्रीय और लोक परंपराओं को जीवित रखना बेहद आवश्यक है। डिजिटल युग के इस दौर में जहां पश्चिमी संगीत का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, वहीं अपनी स्वदेशी कलाओं के प्रति युवाओं को जागरूक करना एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी बन गया है। सरकार और विभिन्न सांस्कृतिक संस्थान इस दिशा में कई प्रयास कर रहे हैं ताकि युवा कलाकारों को प्रोत्साहन मिल सके और वे पारंपरिक वाद्ययंत्रों तथा गायन शैलियों से जुड़े रहें।
इस प्रकार के उच्च स्तरीय विचार और बयान सांस्कृतिक पुनरुत्थान में उत्प्रेरक का काम करते हैं। इनसे न केवल कलाकारों का मनोबल बढ़ता है बल्कि आम जनता को भी अपनी सांस्कृतिक थाती पर गर्व करने का अवसर मिलता है। आने वाले दिनों में यह उम्मीद की जा रही है कि देश भर में कला और संगीत के संरक्षण के लिए और अधिक ठोस कदम उठाए जाएंगे, जिससे हमारी यह अमूल्य धरोहर भविष्य में भी सुरक्षित रह सकेगी और अपनी मिठास से पूरे समाज को पोषित करती रहेगी।