Lucknow Desk : उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़े वर्ग के प्रमुख चेहरों में गिने जाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य एक बार फिर सुर्खियों में हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मौर्य का सियासी ठिकाना एक बार फिर बदलता दिखाई दे रहा है। कभी बसपा में मायावती के करीबी नेताओं में रहे मौर्य भाजपा में गए, फिर समाजवादी पार्टी का रुख किया और 2024 में अपनी पार्टी बनाने के बाद अब कांग्रेस के साथ आने की तस्वीर सामने आई है। 3 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात के बाद उनके इंडिया गठबंधन में शामिल होने की घोषणा हुई। मौर्य का सक्रिय राजनीतिक सफर 1980 के दशक से शुरू हुआ। 1996 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी का दामन थामा और डलमऊ से विधानसभा पहुंचे।
करीब दो दशक तक बसपा में रहने के दौरान उन्होंने संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं और मायावती सरकार में मंत्री भी रहे। 2016 में बसपा से अलग होने के बाद उन्होंने भाजपा का रुख किया। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बनने के बाद योगी आदित्यनाथ की पहली सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मौर्य ने भाजपा छोड़ दी और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। वह सपा सरकार बनने की स्थिति में बड़ी भूमिका की उम्मीद के साथ आगे बढ़े, लेकिन 2022 में कुशीनगर की फाजिलनगर सीट से चुनाव हार गए। बाद में सपा ने उन्हें विधान परिषद भेजा और राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी भी दी। फरवरी 2024 में उन्होंने सपा से भी इस्तीफा दे दिया।
इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी बनाई। 2026 में मौर्य ने भाजपा और सपा से अलग राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिश भी की। जुलाई में चंद्रशेखर आजाद से मुलाकात और सितंबर में तीसरे मोर्चे की संभावनाओं पर उनके बयानों ने इस दिशा में चर्चा तेज की थी। अब अक्टूबर 2026 में कांग्रेस के साथ उनका नया राजनीतिक अध्याय शुरू हुआ है। ऐसे में मौर्य के करीब चार दशक लंबे राजनीतिक सफर में लोकदल और जनता दल से लेकर बसपा, भाजपा, सपा, अपनी पार्टी और अब कांग्रेस-इंडिया गठबंधन तक का सफर नजर आता है। बहरहाल यूपी की राजनीति में सवाल यही है कि लगातार बदलते राजनीतिक ठिकानों के बीच स्वामी प्रसाद मौर्य अब कांग्रेस के साथ कितने समय तक और किस भूमिका में सक्रिय रहते हैं ये तो आगे आने वाला वक्त ही बताएगा पर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उनका यह कदम उनकी आगे की राजनीतिक दिशा का नया अध्याय माना जा रहा है।