इंडिया गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक और बहिष्कार
दिल्ली स्थित कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में आज विपक्षी गठबंधन इंडिया की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई थी। इस आयोजन का प्राथमिक उद्देश्य देश भर में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विस्तृत विचार-विमर्श करना था। गठबंधन के नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निष्कासन या महाभियोग संबंधी प्रस्ताव तैयार करने पर चर्चा करना चाहते थे। हालांकि, चुनावी राजनीति के इस नाजुक मोड़ पर विपक्षी एकता के दावों की धज्जियां उड़ती नजर आईं। आम आदमी पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने इस बैठक का पूरी तरह से बहिष्कार किया, जबकि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने खुद आने के बजाय अपने प्रतिनिधिमंडल को भेजना उचित समझा। इन प्रमुख दलों की अनुपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा विरोधी मोर्चे के भीतर गहरी आंतरिक दरारें अब खुलकर सामने आ गई हैं और संगठनात्मक स्तर पर बड़े मतभेद मौजूद हैं।
विभिन्न दलों का रुख और राजनीतिक कारण
बैठक से दूरी बनाने वाली पार्टियों ने इसके पीछे अपने-अपने ठोस कारण बताए हैं। आम आदमी पार्टी का यह मानना है कि दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में उनकी सीधी प्रतिद्वंदिता कांग्रेस से है, जिसके कारण राष्ट्रीय मंच पर एक साथ आना उनके कैडर के लिए भ्रम पैदा करता है। हालांकि, संजय सिंह ने यह जरूर स्पष्ट किया है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव संसद में आता है, तो वे समर्थन देंगे। दूसरी ओर, द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने कांग्रेस के स्थानीय रुख से नाराजगी जताई है, विशेष रूप से तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी के प्रति कांग्रेस के नरम व्यवहार को लेकर। डीएमके ने खुद को गठबंधन के संगठनात्मक ढांचे से अलग बताते हुए केवल वैचारिक स्तर पर भाजपा विरोध की बात कही है। समाजवादी पार्टी का तर्क है कि उनके प्रमुख उत्तर प्रदेश में आगामी राज्यसभा चुनावों की तैयारियों में व्यस्त हैं, जिसके चलते उन्होंने व्यक्तिगत भागीदारी से किनारा कर लिया है।
गठबंधन के सामने नेतृत्व और समन्वय की चुनौती
क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच बड़े भाई की भूमिका को लेकर जारी विवाद इस बिखराव का एक बड़ा कारण है। ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल जैसे नेता लगातार सामूहिक नेतृत्व मॉडल की वकालत कर रहे हैं, जबकि कांग्रेस पर एजेंडा थोपने के आरोप लगते रहते हैं। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए सीट बंटवारे पर जल्द निर्णय चाहती है, लेकिन क्षेत्रीय नेता अपनी शर्तों पर बातचीत करने के पक्ष में हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यों के स्थानीय समीकरण राष्ट्रीय बैठकों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। यदि विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त या इसी तरह के बड़े मुद्दों पर सरकार को घेरने में विफल रहते हैं, तो यह बिखराव अंततः सत्ता पक्ष को ही चुनावी लाभ पहुंचाएगा। भविष्य में एक ठोस समन्वय ढांचा तैयार करने के लिए उन्हें अपने क्षेत्रीय मतभेदों को पीछे छोड़ना होगा, अन्यथा वैचारिक सहमति के बावजूद यह मोर्चे की कमजोरी बनी रहेगी।