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राजनीति

वोट चोरी का गंभीर दावा: तेजस्वी यादव ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के बजाय मतपत्रों से चुनाव कराने की उठाई मांग

बिहार के प्रमुख राजनीतिक नेता तेजस्वी यादव ने चुनावी प्रणाली पर बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से मतपत्रों के माध्यम से आगामी चुनाव संपन्न कराने की जोरदार मांग रखी है।

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Ankit Yadav
02 अक्ट 2026, 13:57
वोट चोरी का गंभीर दावा: तेजस्वी यादव ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के बजाय मतपत्रों से चुनाव कराने की उठाई मांग

तेजस्वी यादव द्वारा मतपत्र से मतदान कराने की मांग

बिहार के राजनीतिक गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब प्रमुख विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर तीखा हमला बोला। उन्होंने मीडिया के सामने आकर देश और राज्य की वर्तमान निर्वाचन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उनके इस बयान के केंद्र में मतदान के दौरान अपनाई जाने वाली तकनीक और उसकी पारदर्शिता का विषय प्रमुखता से रहा। तेजस्वी यादव ने अपनी बात रखते हुए इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए अब समय आ गया है कि पुरानी व्यवस्था की ओर वापसी की जाए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह मांग उठाई कि भविष्य में होने वाले सभी चुनाव इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से कराने के बजाय पारंपरिक मतपत्रों के जरिए ही संपन्न कराए जाने चाहिए। इस प्रकार के बयानों से राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया है और इस पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। निर्वाचन प्रक्रिया में सुधार की दिशा में इसे एक बड़ा राजनीतिक बयान माना जा रहा है जिसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।

चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता पर उठाया गया गंभीर सवाल

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए तेजस्वी यादव ने देश की चुनावी प्रणाली में निष्पक्षता और पारदर्शिता के अभाव का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने अपने इस दावे के समर्थन में कई बिंदुओं की चर्चा की और कहा कि आम मतदाताओं के मन में वर्तमान प्रणाली को लेकर कई तरह की आशंकाएं बनी हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावों के दौरान वोटों की चोरी जैसी गंभीर घटनाएं हो सकती हैं जिस पर समय रहते रोक लगाना बेहद जरूरी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के आरोप सीधे तौर पर देश की संवैधानिक संस्थाओं और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हैं। नेता ने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र की मूल भावना तभी जीवित रह सकती है जब प्रत्येक नागरिक को यह पूरा भरोसा हो कि उसका वोट सही जगह और सही उम्मीदवार को ही गया है। इस दौरान उन्होंने प्रशासनिक मशीनरी पर भी सवाल उठाए और कहा कि सत्ता पक्ष इसका दुरुपयोग कर सकता है। उनके इन तीखे तेवरों से साफ जाहिर होता है कि आने वाले दिनों में विपक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच लेकर जाने की पूरी तैयारी कर रहा है ताकि इसे एक बड़ा जनआंदोलन बनाया जा सके।

पारंपरिक मतदान प्रणाली की वापसी और उसके मायने

भारत में चुनावी इतिहास का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि देश में लंबे समय तक मतदान की पारंपरिक व्यवस्था ही चलन में रही थी। शुरुआती दशकों में मतदाता पर्ची या मतपेटी और बैलेट पेपर का इस्तेमाल करके ही अपने मताधिकार का प्रयोग करते थे। समय के साथ बदलाव आया और चुनाव आयोग ने प्रक्रिया को तेज तथा पारदर्शी बनाने के लिए आधुनिक मशीनों को अपनाया। लेकिन समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की ओर से इन मशीनों की विश्वसनीयता को लेकर संदेह व्यक्त किए जाते रहे हैं। मतपत्रों से चुनाव कराने की मांग कोई नई बात नहीं है बल्कि इससे पहले भी कई विपक्षी दल इस तरह के विचार देश के सामने रख चुके हैं। जानकारों का कहना है कि इस प्रकार की बहस से लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बनता है और वे अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने के लिए विवश होती हैं। हालांकि चुनाव आयोग हमेशा से आधुनिक मशीनों की सुरक्षा और उनकी अचूकता का दावा करता आया है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दलों के इस प्रकार के दबाव का निर्वाचन आयोग की नीतियों पर कितना और कैसा असर पड़ता है।

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