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राजनीति

युवा राजनीति का नया दौर: अशोक गहलोत के पचास प्रतिशत टिकट वाले प्रस्ताव पर बीजेपी का तीखा पलटवार

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा स्थानीय निकाय चुनावों में युवाओं और जेन-जी को प्राथमिकता देने की मांग ने राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। इस प्रस्ताव पर विपक्षी दल ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

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Ankit Yadav
20 अग 2026, 11:17
युवा राजनीति का नया दौर: अशोक गहलोत के पचास प्रतिशत टिकट वाले प्रस्ताव पर बीजेपी का तीखा पलटवार
आगामी चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक दलों में रणनीतिक बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। इसी कड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री ने एक बड़ा राजनीतिक दांव चलते हुए मांग की है कि आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस पार्टी के आधे से अधिक टिकट युवाओं और जेन-जी वर्ग के नए चेहरों को दिए जाने चाहिए। उनका तर्क है कि देश और समाज में एक नई पीढ़ी तेजी से उभर रही है जिसे निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना बेहद आवश्यक है। इस प्रस्ताव के सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में इस बात पर मंथन शुरू हो गया कि क्या पारंपरिक दल वास्तव में युवाओं को इतनी बड़ी हिस्सेदारी देने का साहस दिखा पाएंगे या यह केवल एक बयान बनकर रह जाएगा।

विपक्षी दल का तंज और पारिवारिक राजनीति का मुद्दा

कांग्रेस नेता के इस युवा-मुखी बयान पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने तुरंत कड़ा रुख अपनाते हुए करारा हमला बोला है। बीजेपी के प्रवक्ताओं ने इसे महज़ एक राजनीतिक नौटंकी करार देते हुए उस पर तीखा तंज कसा है। विपक्षी दल का आरोप है कि जो पार्टी खुद दशकों से एक ही परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित रही हो, वह भला युवाओं और आम कार्यकर्ताओं को सही मायनों में नेतृत्व का अवसर कैसे दे सकती है। इस जुबानी जंग ने राज्य की राजनीति का तापमान काफी बढ़ा दिया है और दोनों तरफ से एक-दूसरे की आंतरिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जिससे आने वाले चुनावी मुकाबले के बेहद दिलचस्प होने के संकेत मिल रहे हैं।

संगठनात्मक बदलावों की आवश्यकता

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बदलते दौर में हर पार्टी पर युवा मतदाताओं को साधने का भारी दबाव रहता है। हालांकि, केवल बयानों या कोरे कागजों पर प्रतिशत तय कर देने से धरातल पर बदलाव आना आसान नहीं होता है। अनुभवी नेताओं के अनुभव और नई पीढ़ी की ऊर्जा के बीच संतुलन बिठाना किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए हमेशा से एक बड़ी परीक्षा रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस वास्तव में इस प्रस्ताव को अपनी जमीनी रणनीति का हिस्सा बनाती है या फिर यह केवल चुनावी मौसम का एक शिगूफा बनकर रह जाता है, जिसका फायदा या नुकसान दोनों दल अपने-अपने तरीके से उठाने की कोशिश करेंगे।
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