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उत्तर प्रदेश में भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्राप्त उत्पादों की संख्या देश में सबसे आगे, सांस्कृतिक विरासत को मिला बढ़ावा

अपनी अनूठी कला, हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों के लिए पहचाने जाने वाले उत्तर प्रदेश राज्य ने भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग प्राप्त करने के मामले में देश भर में विशिष्ट स्थान हासिल किया है।

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Kantap News डेस्क
11 अग 2026, 00:00
उत्तर प्रदेश में भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्राप्त उत्पादों की संख्या देश में सबसे आगे, सांस्कृतिक विरासत को मिला बढ़ावा

वाराणसी की सिल्क साड़ियों से लेकर लखनऊ की चिकनकारी और मिर्जापुर के हस्तनिर्मित उत्पादों तक, उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। राज्य के विभिन्न जनपदों के पारंपरिक कारीगरों और बुनकरों की कला को संरक्षित करने के लिए सरकार द्वारा विशेष प्रयास किए जा रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में स्थानीय उत्पादों को जीआई टैग प्रदान किया गया है। इससे न केवल स्थानीय कारीगरों को आर्थिक सुरक्षा मिली है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी उनकी मांग में भारी उछाल आया है।

पारंपरिक शिल्पकला का संरक्षण

विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से नकली उत्पादों की बिक्री पर रोक लगती है और असली कारीगरों को उनकी मेहनत का उचित पारिश्रमिक मिलता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए एक विशेष कार्ययोजना तैयार की थी जिसके तहत राज्य के कोने-कोने से पारंपरिक और विशिष्ट वस्तुओं की पहचान कर उनके प्रमाणन के लिए आवेदन किए गए थे। भदोही के कालीन, गोरखपुर के टेराकोटा और मूंज के उत्पादों जैसी अनूठी कलाओं को इस सूची में शामिल किए जाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व मजबूती मिली है।

आर्थिक विकास और रोजगार के नए अवसर

इस उपलब्धि का असर केवल कला और संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पर्यटन और व्यापार के क्षेत्र में भी नए द्वार खुले हैं। राज्य के विभिन्न जिलों में क्लस्टर आधारित विकास मॉडल को अपनाया जा रहा है जिससे युवाओं को अपने पैतृक हुनर से जुड़ने और स्वरोजगार के बेहतरीन अवसर प्राप्त हो रहे हैं। प्रशासन का लक्ष्य आने वाले समय में कुछ और स्थानीय उत्पादों को इस प्रतिष्ठित सूची में शामिल कराना है ताकि राज्य की समृद्ध विरासत का डंका पूरी दुनिया में बज सके।

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