भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार माने जाने वाला मानसून इस सीजन में काफी असमान व्यवहार कर रहा है। कभी अत्यधिक मूसलाधार बारिश तो कभी लंबी सूखा अवधि किसानों के लिए बड़ी सिरदर्दी बन गई है। धान, सोयाबीन और मक्का जैसी प्रमुख खरीफ की फसलों को इस अनियमित मौसम के कारण भारी नुकसान पहुंच रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले हफ्तों में मौसम में सुधार नहीं हुआ, तो पैदावार के आंकड़ों में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है। किसानों ने अपनी लागत निकालने को लेकर चिंता व्यक्त की है क्योंकि महंगे बीज और उर्वरक खरीदने के बाद भी फसल बर्बाद होने का खतरा मंडरा रहा है।
फसल सुरक्षा और सरकारी सहायता के उपायों पर उच्च स्तरीय चर्चा इस गंभीर स्थिति को देखते हुए कृषि मंत्रालयों और संबंधित विभागों ने आपातकालीन बैठकें शुरू कर दी हैं। राज्य सरकारों द्वारा जिला स्तर पर फसल नुकसान के आकलन के लिए विशेष टीमों का गठन किया जा रहा है ताकि प्रभावित किसानों को समय पर मुआवजा दिया जा सके। आधुनिक सिंचाई तकनीकों और फसल बीमा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया जा रहा है ताकि इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से अन्नदाताओं को वित्तीय सुरक्षा मिल सके। कई क्षेत्रों में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को खेतों में जलभराव की निकासी के लिए उचित प्रबंध करने की सलाह दी है ताकि जड़ों को सड़ने से बचाया जा सके।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभाव और बाजार की स्थिति फसलों के खराब होने की आशंका का सीधा असर स्थानीय बाजारों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। जिंस बाजारों में खाद्यान्न की आपूर्ति बाधित होने से आने वाले महीनों में महंगाई बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। सरकार और सहकारिता समितियां यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही हैं कि किसानों को खाद और कीटनाशकों की कोई कमी न हो और उन्हें आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जाए। ग्रामीण स्तर पर रोजगार और आय के अन्य स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए भी नई योजनाओं की रूपरेखा तैयार की जा रही है ताकि किसानों की आर्थिक स्थिति को संबल मिल सके।