कानूनी ढांचे में बदलाव की पहल
अक्टूबर की 18 तारीख की सुबह को सोलहवें सत्र की कार्यवाही के दौरान, मंत्री ले होआई ट्रुंग ने सरकार की तरफ से एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सदन के पटल पर रखा। प्रधानमंत्री के निर्देश पर लाए गए इस शासकीय प्रस्ताव का संबंध समझौतों से जुड़े संशोधित कानून के प्रारूप से है। इस प्रस्ताव को तीस सितंबर, 2026 को तैयार किया गया था। सदन की रक्षा और विदेश मामलों से जुड़ी समिति के प्रमुख ने इस विषय पर अपनी विधिवत सत्यापन रिपोर्ट भी सबके सामने रखी। मंत्री महोदय ने अपने संबोधन में बताया कि वर्ष 2020 में पारित किए गए सत्तरवें नंबर के कानून ने पिछले पांच वर्षों तक संधियों के संचालन में मुख्य भूमिका निभाई है। पहली जुलाई, 2021 से लागू हुए उस पुराने विनियामक ढांचे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लचीलापन प्रदान किया था। हालांकि, बीते पांच वर्षों के दौरान इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन में कुछ ऐसी अड़चनें और सीमाएं सामने आईं जिनसे निपटने के लिए इसमें बड़े पैमाने पर संशोधन करने की आवश्यकता महसूस की गई। इन्हीं कमियों को दूर करने और कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने के उद्देश्य से अब यह नया संशोधित खाका सदन के विचार के लिए प्रस्तुत किया गया है ताकि मौजूदा जरूरतों को पूरा किया जा सके।
नए मसौदे का विस्तृत ढांचा और दायरे का विस्तार
प्रस्तावित नए कानून में कुल छह अध्याय और सैंतालीस अनुच्छेद शामिल किए गए हैं जिन्हें तीन प्रमुख नीतियों के आधार पर तैयार किया गया है। इन नीतियों का मुख्य फोकस दायरे को व्यापक बनाना, प्रक्रियाओं को आसान करना तथा प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत करना है। इस नए बदलाव के तहत समझौते की परिभाषा को पहले से अधिक स्पष्ट किया गया है ताकि इसे संधियों से अलग समझा जा सके। अब इसके दायरे में कई नए निकायों को भी शामिल किया गया है जिनमें विशेष आर्थिक क्षेत्रों और औद्योगिक पार्कों के प्रबंधन बोर्ड के साथ-साथ सार्वजनिक संस्थाएं भी आती हैं। स्थानीय स्तर पर दो चरणों वाले प्रशासनिक सुधार और कम्यून समितियों के अधिकारों में वृद्धि के बाद यह कदम उठाया गया है। इसके अलावा, आपातकालीन राहत, महामारी प्रबंधन और आपदा से जुड़े मामलों में त्वरित कार्रवाई के लिए सरल प्रक्रियाओं का दायरा बढ़ाया गया है। डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल को बढ़ावा देते हुए इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षरों को भी कानूनी मान्यता देने का प्रावधान जोड़ा गया है, हालांकि यह व्यवस्था शीर्ष स्तर के समझौतों पर लागू नहीं होगी। विदेश मंत्रालय को इस पूरी प्रक्रिया के तहत एक केंद्रीय डेटाबेस तैयार करने और उसके संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है ताकि सभी दस्तावेजों का सुरक्षित रखरखाव सुगम हो सके।
पुरानी व्यवस्था की समीक्षा और भविष्य की दिशा
मौजूदा नियमों में बदलाव की यह पहल राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। पोलित ब्यूरो के तीस अप्रैल, 2025 के उस संकल्प के अनुरूप यह बदलाव किया गया है जिसके तहत संसद का काम मुख्य रूप से बुनियादी और वैधानिक सिद्धांतों को तय करना है, जबकि व्यावहारिक व जमीनी स्तर के मामलों को सरकार के जिम्मे छोड़ा गया है। इसी आधार पर पुराने कानूनों में आंशिक संशोधन करने की बजाय पूरे विनियामक ढांचे को बदलकर नया रूप दिया जा रहा है। समीक्षा समिति ने नए प्रस्तावों पर अपनी सहमति जताते हुए संबंधित इकाइयों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने का सुझाव दिया है। इस पूरी कवायद का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि देश के हित सुरक्षित रहें और सभी प्रशासनिक इकाइयां अपनी सीमा के भीतर रहकर प्रभावी रूप से काम करें। यदि सभी प्रक्रियाएं तय योजना के अनुसार आगे बढ़ती हैं, तो इस नए कानून के आगामी वर्ष दो हजार सत्ताईस की पहली मार्च से पूरी तरह लागू हो जाने की संभावना है। इसके लागू होने से अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़े विभिन्न स्तरों पर फैसले लेने की प्रक्रिया न केवल अधिक पारदर्शी बनेगी बल्कि उसमें अनावश्यक प्रशासनिक देरी से भी राहत मिलेगी।