विज्ञान भवन में शुरू हुआ तीन दिवसीय वैश्विक आयोजन
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम की शुरुआत बुधवार को राष्ट्रीय राजधानी के विज्ञान भवन परिसर में हुई। इस बड़े आयोजन का मुख्य विषय विश्व भर के साथ हमारे पुराने सांस्कृतिक रिश्तों को तलाशना है। इस महत्वपूर्ण सत्र में कुल पचास अलग-अलग देशों के राजदूत और प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने दीप प्रज्वलित कर या भाषण देकर इस तीन दिवसीय कार्यक्रम का आधिकारिक शुभारंभ किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से एक विशेष शुभकामना संदेश भेजा गया था जिसे मंच पर केंद्रीय संस्कृति विभाग के सचिव विवेक अग्रवाल ने उपस्थित लोगों को पढ़कर सुनाया। यह पूरा आयोजन बृहत्तर भारत परिषद् की स्थापना के एक सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में हो रहा है जिसकी शुरुआत चौदह अक्टूबर को हुई थी और यह सत्र सोलह अक्टूबर तक चलना है। इस मंच पर विभिन्न देशों के राजनयिकों ने भी अपने विचार रखे और भारत के साथ अपने प्राचीन संबंधों को याद किया। उद्घाटन से पहले एक विशेष पूर्ण सत्र का आयोजन किया गया था जिसमें लिथुआनिया और फिजी समेत कई देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और अपनी बात रखी। इस दौरान एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई जिसका अवलोकन मंत्रियों और विदेशी मेहमानों ने किया।
प्राचीन ज्ञान परंपराओं से जुड़ रहे हैं दुनिया के तमाम समाज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भेजे गए संदेश में इस बात पर जोर दिया कि देश की सभ्यतागत यात्रा हमेशा से ही आपसी मेलजोल और आदान-प्रदान की एक जीवंत कहानी रही है। नालंदा जैसे प्राचीन और महान ज्ञान केंद्रों ने हमारे क्षेत्र और एशिया के बाकी हिस्सों के बीच बौद्धिक संपदा के आवागमन को बहुत अधिक मजबूत किया था। पुराने समय में बौद्ध भिक्षुओं, ज्ञानी विद्वानों, दूर-दूर से आने वाले व्यापारियों तथा यात्रियों ने पैदल रास्तों और समुद्री मार्ग के जरिए भारतीय विचारों को पूरी दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाया था। आज के समय में भी योग का वैश्विक प्रसार इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि हमारी पुरानी परंपराएं आज भी विभिन्न संस्कृतियों के इंसानों को आपस में बांधकर रखती हैं। इसके अलावा हमारे देश का दर्शन, संगीत, नृत्य कला, साहित्य, सिनेमा और खान-पान की विविधताएं दुनिया भर के समाजों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। कई विदेशी धरती पर आज भी हमारे त्योहार बहुत उत्साह के साथ मनाए जाते हैं जो आपसी भाईचारे को बढ़ावा देते हैं। कार्यक्रम के दौरान संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के आयोजनों का मकसद केवल बीते इतिहास की चर्चा करना नहीं है, बल्कि यह देखना है कि अतीत का ज्ञान भविष्य की दिशा तय करने में कैसे मदद कर सकता है। जब अलग-अलग सभ्यताएं मिलती हैं तो विचारों का आदान-प्रदान होता है और कला को नए रूप मिलते हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृति का मूल कार्य हमेशा से इंसानी समाजों को एक साथ जोड़ना रहा है, न कि उन्हें किसी भी तरह से आपस में बांटना।
साझा विरासत के दस्तावेजीकरण और संयुक्त शोध पर जोर
संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल ने अपने संबोधन में कहा कि मंत्रालय के लिए यह अत्यंत गौरव का विषय है कि उसे दुनिया के अन्य राष्ट्रों के साथ अपने पुराने संबंधों को उजागर करने का यह दायित्व मिला है। इन ऐतिहासिक संबंधों को ठोस सबूतों के आधार पर स्थापित करने के लिए अकादमिक शोध करना और दूसरे देशों के विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करना बहुत जरूरी है। बृहत्तर भारत परियोजना के अंतर्गत अब अलग-अलग देशों के विद्वान मिलकर प्रामाणिक विषयों पर संयुक्त शोध करेंगे और शोधपत्र तैयार किए जाएंगे। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ। सच्चिदानंद जोशी ने अपने स्वागत भाषण में बताया कि किसी भी सभ्यता की असली पहचान उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं बल्कि उसके विचारों के सफर और स्मृतियों से होती है। यह परियोजना संस्कृति मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध प्रभाग की एक महत्वपूर्ण योजना है जिसे कला केंद्र द्वारा जमीन पर उतारा जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत और चयनित देशों की साझा विरासत की पहचान करना, उसका पूरा दस्तावेजीकरण करना और उसे सुरक्षित रखते हुए आम लोगों के लिए सुलभ बनाना है। इस परियोजना के माध्यम से राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर उन सभी क्षेत्रों को समझने पर विशेष बल दिया जा रहा है जहां पुराने समय में इंसानों के बीच संपर्क हुआ था। इस पूरे तीन दिवसीय सम्मेलन से भारत और दुनिया के बीच ऐतिहासिक समझ और अधिक प्रगाढ़ होने की पूरी उम्मीद जताई गई है।