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बड़ी चिंता: तकनीकी संस्थानों में आठ लाख से अधिक सीटें खाली रहीं, एआईसीटीई के आंकड़ों से हुआ खुलासा
देशभर के तकनीकी संस्थानों में दाखिले को लेकर एक बार फिर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न पाठ्यक्रमों में साढ़े आठ लाख से अधिक सीटें खाली रह गई हैं, जिससे शिक्षा जगत में गंभीर चर्चा छिड़ गई है।
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Ankit Yadav
30 अग 2026, 13:05
देश के तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों की मौजूदा स्थिति पर ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) की एक रिपोर्ट ने बड़ा खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया शैक्षणिक सत्र के दौरान देश के विभिन्न इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और अन्य तकनीकी संस्थानों में साढ़े आठ लाख से अधिक सीटें बिना भरी रह गईं। यह स्थिति देश के उच्च शिक्षा ढांचे और तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता व प्रासंगिकता पर कई सवाल खड़े करती है, क्योंकि हर साल लाखों छात्र इन संस्थानों से जुड़ने की उम्मीद रखते हैं लेकिन बड़े पैमाने पर सीटें खाली रहना एक नई चुनौती बन गया है।
बढ़ता खाली सीटों का संकट
एआईसीटीई द्वारा जारी किए गए इन ताजा आंकड़ों ने शैक्षणिक विश्लेषकों और नीति निर्माताओं को हैरान कर दिया है। जानकारों का मानना है कि पारंपरिक पाठ्यक्रमों के प्रति छात्रों का मोहभंग होना और आधुनिक इंडस्ट्री की मांग के अनुसार पाठ्यक्रम का अपडेट न होना इसका एक बड़ा कारण हो सकता है। इसके अलावा, देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्थित कई निजी तकनीकी संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं और प्लेसमेंट रिकॉर्ड की कमी के कारण भी विद्यार्थी दाखिला लेने से कतराते हैं। लगातार बढ़ रही यह खाली सीटों की संख्या न केवल संस्थानों के वित्तीय स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि संसाधनों के बड़े पैमाने पर अपव्यय का कारण भी बनती है।
इस पूरे परिदृश्य को लेकर शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थानों और नियामक निकायों को मिलकर एक ठोस रणनीति तैयार करनी होगी। जब तक तकनीकी शिक्षा को सीधे तौर पर रोजगार बाजार की वर्तमान जरूरतों से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक इस तरह की समस्याओं का समाधान मिलना कठिन होगा। कई कॉलेज अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और अन्य उभरती हुई तकनीकों के कोर्स शुरू करके छात्रों को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन पारंपरिक इंजीनियरिंग की शाखाओं में स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि एआईसीटीई और केंद्र सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए क्या नए कदम उठाते हैं। शिक्षा मंत्रालय और नियामक बोर्ड मिलकर संस्थानों की कार्यप्रणाली में सुधार लाने तथा छात्रों का रुझान पुनः तकनीकी शिक्षा की ओर बढ़ाने के लिए काउंसलिंग और नीतिगत बदलावों पर विचार कर रहे हैं। यदि समय रहते आवश्यक सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में तकनीकी संस्थानों के लिए अपनी साख और वित्तीय संतुलन बचाना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।