पारंपरिक मतदान का अनोखा स्वरूप
राजस्थान के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में 1960 के दशक में सरपंचों का चुनाव वर्तमान युग की मतदान प्रक्रियाओं से बिल्कुल भिन्न तरीके से संपन्न होता था। आज की तरह न तो उस समय गुप्त मतदान की व्यवस्था थी और न ही मशीनों का उपयोग किया जाता था। बस्सी और जमवा रामगढ़ के क्षेत्रों में रहने वाले बुजुर्गों ने उस दौर की व्यवस्थाओं पर प्रकाश डाला है कि कैसे गांव का सरपंच चुनने के लिए पूरी ग्राम सभा एकत्रित होती थी। बस्सी स्थित कानड़वास गांव के निवासी 96 वर्षीय रामसहाय और बूडथल गांव की 85 वर्षीय भ्धापू ने अपनी यादें साझा करते हुए बताया कि चुनाव प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की आधुनिकता का अभाव था। ग्रामीण अपनी मर्जी और स्पष्ट समर्थन दिखाने के लिए खुले मैदान या चौपालों पर इकट्ठा होकर सार्वजनिक रूप से अपना वोट दर्ज करवाते थे। यह प्रक्रिया पूरी तरह से खुली हुई थी, जिसमें हर ग्रामीण दूसरे का रुख आसानी से देख सकता था। चुनाव का संचालन पूरी तरह से स्थानीय स्तर पर होता था, जिसमें मतदाता सूची की जटिलता के बजाय आम सहमति को अधिक महत्व दिया जाता था, जो आज के समय में किसी पुरानी कहानी जैसा प्रतीत होता है।
समर्थन प्रदर्शित करने के अनूठे उपाय
प्रत्याशियों के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए ग्रामीणों ने बेहद रचनात्मक और सरल तरीके इजाद कर रखे थे। चतरपुरा के निवासी फैलीराम ने उन दिनों को याद करते हुए बताया कि चुनाव वाले दिन मैदान में प्रत्याशी के नाम की घोषणा की जाती थी। इसके बाद प्रत्याशियों के समर्थकों को अपना हाथ ऊपर उठाकर अपनी पसंद स्पष्ट करने के लिए कहा जाता था। जिस उम्मीदवार के पक्ष में अधिक हाथ उठते थे, उसे ही उस चुनाव का विजेता घोषित कर दिया जाता था। इस पद्धति में पारदर्शिता के साथ-साथ यह भी पता होता था कि गांव का कौन सा व्यक्ति किस प्रत्याशी का समर्थन कर रहा है। इसके अलावा एक और तरीका रस्सी का उपयोग करके अपनाया जाता था। मैदान के बीचों-बीच रस्सी को खींचकर बांध दिया जाता था। प्रत्याशी के समर्थकों को रस्सी के एक तरफ और दूसरे प्रतिद्वंद्वी के समर्थकों को दूसरी तरफ खड़े रहने का निर्देश दिया जाता था। जिधर खड़े लोगों की संख्या अधिक होती थी, उसे ही विजयी मान लिया जाता था। इस प्रत्यक्ष तरीके से परिणाम तुरंत मौके पर ही मिल जाता था।
लोकतंत्र के शुरुआती दौर की झलक
चुनाव की यह प्रक्रिया उस समय के ग्रामीण लोकतंत्र की सादगी और खुलेपन को दर्शाती है, जिसे आज की आधुनिक डिजिटल व्यवस्थाओं से जोड़कर देखना चुनौतीपूर्ण है। आज हम जिस मतदान केंद्र, गोपनीय मतपत्र और आधुनिक ईवीएम प्रणाली की बात करते हैं, उसका 1960 के दशक में अस्तित्व नहीं था। ग्रामीणों के लिए सरपंच का चुनाव करना एक सामाजिक आयोजन की तरह होता था, जिसमें किसी भी प्रकार का छिपाव नहीं था। लोग चौपाल पर बैठकर ही अपने गांव का नेतृत्व करने वाले प्रतिनिधि को चुन लेते थे। बुजुर्गों द्वारा बताई गई ये बातें इस बात का प्रमाण हैं कि लोकतांत्रिक अधिकार के प्रयोग के तरीके समय के साथ किस तरह से बदलते गए हैं। बस्सी और जमवा रामगढ़ जैसे क्षेत्रों के लोगों ने जो अनुभव साझा किए, वे राजस्थान के उस दौर की चुनावी संस्कृति के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। यह व्यवस्था भले ही आज के मानकों पर खरी न उतरे, लेकिन उस वक्त यह ग्रामीण विकास और स्थानीय प्रबंधन के लिए पूरी तरह से कारगर साबित होती थी। चुनाव के इन पुराने किस्सों से पता चलता है कि कैसे एक दौर में गांव की एकता और आपसी सहमति के आधार पर ही सत्ता का हस्तांतरण होता था।