गुलाबी शहर की विरासत का विनाश
भारत के ऐतिहासिक शहरों जैसे जयपुर, लखनऊ, आगरा, कोलकाता और मुंबई में सदियों पुरानी वास्तुशिल्प धरोहरें मौजूद हैं। ये हवेलियां केवल चूने और पत्थरों का ढांचा नहीं हैं बल्कि इतिहास की एक जीवंत कथा बयां करती हैं। दुर्भाग्य से बढ़ती जनसंख्या और मुनाफे की अंधी दौड़ के चलते इन धरोहरों को कंक्रीट के आधुनिक बाजारों और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में बदला जा रहा है। साल 2019 में जब यूनेस्को ने जयपुर को विश्व धरोहर का दर्जा दिया था, तब चारदीवारी के भीतर लगभग 1200 पारंपरिक हवेलियां मौजूद थीं। आज उनमें से करीब 33 प्रतिशत इमारतें पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। प्रशासनिक उदासीनता और नियमों की अनदेखी के चलते यह संकट भयावह रूप ले चुका है। हर साल पुरानी इमारतों के गिरने से होने वाले हादसों में बेगुनाह लोगों की जान जा रही है, जो सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। यह स्थिति केवल एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे देश के ऐतिहासिक शहरों की चिंताजनक सच्चाई बन गई है।
निर्माण कार्यों में नियमों की अनदेखी
जयपुर के चौड़ा रास्ता स्थित 'पूजा घर' हवेली इस अनियंत्रित निर्माण गतिविधि का एक जीता-जागता उदाहरण है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस आवासीय हवेली की दुकानों के बीच मुख्य पिलर और विभाजन वाली दीवारों को हटाकर भारी खुदाई की गई है ताकि बेसमेंट बनाया जा सके। निवासियों का आरोप है कि इससे पूरी इमारत की नींव कमजोर हो गई है और यह आसपास की गली के लिए खतरा बन चुकी है। हालांकि, निर्माण कार्य से जुड़े इंजीनियर मुकेश का तर्क है कि वे किसी नियम का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। उनके दावे के अनुसार, सभी आवश्यक दस्तावेज नगर निगम को सौंपे गए हैं और जिस तहखाने को नया बताया जा रहा है, वह पहले से अस्तित्व में था। इसी तरह त्रिपोलिया बाजार में भी हवेलियों का स्वरूप बदलकर उन्हें दुकानों में तब्दील किया गया है। व्यापार मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र गुप्ता के अनुसार, एक ही हवेली के भीतर कई दफ्तर और दुकानें खुल जाने से ऐतिहासिक ढांचे की मजबूती पर भारी दबाव पड़ा है और पार्किंग की समस्या भी विकराल हो गई है।
सार्वजनिक बरामदों पर अवैध कब्जा
इतिहासकार देवेंद्र भगत के मुताबिक, हमारे पूर्वजों ने इन शहरों को पैदल चलने वालों की सुविधा को ध्यान में रखकर योजनाबद्ध तरीके से बसाया था। दुकानों के सामने छायादार बरामदे हमारी साझा सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं, लेकिन वर्तमान में इन्हें अस्थाई दीवारों से घेरकर इन पर अवैध कब्जे किए जा रहे हैं। नेहरू बाजार और बापू बाजार जैसे क्षेत्रों में रेस्टोरेंट चलाने वाले लोग सार्वजनिक बरामदों का उपयोग व्यवसाय के लिए कर रहे हैं। यहां तक कि स्थानीय प्रशासन पर भी इन नियमों के उल्लंघन का आरोप है, जहां स्मार्ट सिटी प्रशासन खुद इन बरामदों पर जालीदार दीवारें खड़ी कर रहा है। असुरक्षित निर्माणों का खौफनाक मंजर सुभाष चौक में देखा गया, जहां एक चार मंजिला इमारत गिरने से दो लोगों की मृत्यु हो गई। वहीं, जगन्नाथ शाह के रास्ते में एक पांच मंजिला इमारत झुकने के कारण आठ से दस परिवारों को अपना घर छोड़ना पड़ा था। प्रशासन इन जर्जर ढांचों को नोटिस तो भेजता है, लेकिन सुरक्षा की जमीनी हकीकत आज भी बेहद डरावनी बनी हुई है।