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राजनीति

बढ़ता अंधविश्वास: पूर्व आईएएस नियाज खान ने मस्जिदों के नीचे मंदिर तलाशने पर जताई गहरी चिंता

पूर्व आईएएस अधिकारी नियाज खान ने समाज में तेजी से बढ़ रहे अंधविश्वास और धार्मिक अतिरेक पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अपने एक बयान में कहा है कि वर्तमान समय में मस्जिदों के नीचे मंदिर खोजने का सिलसिला चरम पर पहुंच चुका है, जो चिंता का विषय है।

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Ankit Yadav
07 सित 2026, 16:51
बढ़ता अंधविश्वास: पूर्व आईएएस नियाज खान ने मस्जिदों के नीचे मंदिर तलाशने पर जताई गहरी चिंता
हाल ही के दिनों में देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद और दावे किए जा रहे हैं। इसी सिलसिले में पूर्व आईएएस अधिकारी नियाज खान ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के माध्यम से अपनी बेबाक राय रखी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज के दौर में जिस प्रकार से मस्जिदों के नीचे प्राचीन मंदिरों की खोज करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, वह समाज में धार्मिक उन्माद और अंधीभक्ति को और अधिक बढ़ावा दे रही है। उनके अनुसार, यह स्थिति न केवल आपसी सौहार्द के लिए खतरनाक है बल्कि देश की वैज्ञानिक और तार्किक सोच को भी पीछे धकेल रही है।

अंधभक्ति और समाज पर प्रभाव

नियाज खान ने अपने संदेश में इस बात पर जोर दिया कि समाज का एक बड़ा वर्ग इस समय अंधविश्वास की गिरफ्त में आ चुका है। जब लोगतार्किक और विकास संबंधी मुद्दों को छोड़कर केवल ऐतिहासिक और धार्मिक विवादों में उलझ जाते हैं, तो इससे राष्ट्र की प्रगति बाधित होती है। उन्होंने कहा कि अंधीभक्ति की पराकाष्ठा यह है कि बिना किसी ठोस और प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य के धार्मिक स्थलों को लेकर इस तरह के दावे किए जा रहे हैं, जिससे आम जनता का ध्यान असल समस्याओं से भटक जाता है। पूर्व अधिकारी ने चेतावनी दी है कि यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह हमारे सामाजिक ताने-बाने को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकती है। देशभर के बुद्धिजीवी वर्ग और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस प्रकार की घटनाओं पर समय-समय पर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि इस तरह के विवादों से समाज में ध्रुवीकरण गहरा होता है और शांति व्यवस्था बनाए रखने में प्रशासन के सामने भी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। नियाज खान की इस टिप्पणी के बाद से सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई है, जहां लोग उनके पक्ष और विपक्ष में अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कर रहे हैं। कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और यथार्थवादी सोच मान रहे हैं, तो वहीं कुछ अन्य लोग इस पर तीखी प्रतिक्रिया भी दे रहे हैं।

विशेषज्ञों की राय और भविष्य की चिंताएं

विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों को अदालतों और संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही सुलझाया जाना चाहिए, न कि सार्वजनिक मंचों पर भावनाओं को भड़काकर। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जहां विभिन्न धर्मों के लोग सदियों से मिलजुलकर रहते आए हैं, वहां इस प्रकार के विवादों का बढ़ना किसी भी स्थिति में हितकर नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि लोग संयम से काम लें और देश की गंगा-जमुनी तहजीब को बनाए रखने में अपना योगदान दें, ताकि किसी भी प्रकार की अशांति से बचा जा सके।
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