मक्का पैक्ट पर पाकिस्तान में मचा राजनीतिक बवाल
पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में मक्का पैक्ट को लेकर इन दिनों भारी हंगामा देखने को मिल रहा है। इस अहम समझौते के सामने आने के बाद देश की राजनीति में एक नया तूफान खड़ा हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार आ गए हैं। हूतियों के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई के मामलों में उनकी भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। विपक्षी दलों और स्थानीय नेताओं ने सरकार के इस रुख पर गहरी आपत्ति जताई है। इस्लामाबाद से लेकर अन्य बड़े शहरों तक इस समझौते की शर्तों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विदेश मंत्री की इस मामले में फजीहत होने के बाद कूटनीतिक हलकों में भी हड़कंप मच गया है। सरकार के नुमाइंदे इस मुद्दे पर सफाई देने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन विरोध शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। आम जनता के बीच भी इस बात को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं कि देश की विदेश नीति किस दिशा में जा रही है। इस प्रकार यह पूरा मामला देश की मौजूदा राजनीति का सबसे गर्म विषय बन चुका है और हर कोई इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है। सरकार के लिए इस विवाद से बाहर निकलना बेहद मुश्किल साबित होता दिख रहा है क्योंकि विपक्ष लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए है। विदेश मंत्रालय के भीतर भी इस संकट से निपटने के लिए बैठकों का दौर शुरू हो चुका है।
विदेश मंत्री इशाक डार की भूमिका पर उठे सवाल
विदेश मंत्री इशाक डार पर हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के फैसलों को लेकर चौतरफा दबाव बढ़ता जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के समझौतों से देश की सुरक्षा और कूटनीतिक हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। पाकिस्तान के भीतर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने इस बात पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों को संसद में चर्चा के बिना आगे बढ़ाया गया। इशाक डार की ओर से इस मामले में अब तक आए बयानों को नाकाफी माना जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इस पैक्ट के सामरिक निहितार्थ बहुत गहरे हैं और इसके परिणाम देश को लंबे समय तक भुगतने पड़ सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान की इस स्थिति को लेकर बहस छिड़ गई है। देश के प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विदेश मंत्रालय को अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करनी चाहिए। सैन्य कार्रवाई जैसे गंभीर मुद्दों पर जनता को अंधेरे में रखना देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए ठीक नहीं है। संसद के आगामी सत्र में भी इस मुद्दे पर जोरदार हंगामा होने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। विपक्षी सांसद इस मामले में विदेश मंत्री के इस्तीफे की मांग तक करने की तैयारी कर रहे हैं। इस प्रकार इशाक डार के लिए यह राजनीतिक संकट दिन-प्रतिदिन और अधिक गहराता जा रहा है जिससे सरकार की मुश्किलें भी काफी बढ़ गई हैं।
समझौते की पृष्ठभूमि और इसके संभावित बड़े परिणाम
मध्य पूर्व के कूटनीतिक घटनाक्रमों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के संदर्भ में मक्का पैक्ट को बेहद संवेदनशील माना जाता है। इस तरह के समझौतों का उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा को बनाए रखना होता है लेकिन कई बार इनसे आंतरिक राजनीतिक विवाद भी पैदा हो जाते हैं। पाकिस्तान जैसे देश के लिए जहां की अर्थव्यवस्था और राजनीतिक स्थिति पहले से ही नाजुक दौर से गुजर रही है, ऐसे कूटनीतिक कदम अतिरिक्त तनाव पैदा कर देते हैं। हूतियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई में शामिल होने के विचार से ही देश के भीतर धार्मिक और राजनीतिक आधार पर ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ जाता है। इतिहास गवाह है कि मध्य पूर्व के संघर्षों में उलझने से पाकिस्तान को पहले भी कई बार कूटनीतिक मोर्चों पर नुकसान उठाना पड़ा है। विश्लेषकों का मानना है कि सरकार को ऐसे मामलों में निर्णय लेने से पहले सभी संबंधित पक्षों और संसद को विश्वास में लेना चाहिए था। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर से इस बहस को जन्म दे दिया है कि पाकिस्तान की विदेश नीति का संचालन किस प्रकार किया जाना चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस भारी विरोध के बीच अपने इस कदम पर कायम रहती है या नीति में कोई बदलाव करती है। फिलहाल इस पैक्ट के कारण उपजा यह बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है और देश का हर तबका इस पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है।