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बढ़ता व्यापार घाटा: ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार में भारत को 224 अरब डॉलर का नुकसान

वैश्विक व्यापार मंच पर ब्रिक्स देशों के साथ भारत के वाणिज्यिक संबंधों को लेकर हालिया आंकड़े सामने आए हैं, जिनसे एक बड़े व्यापार घाटे का खुलासा हुआ है।

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Ankit Yadav
12 सित 2026, 11:29
बढ़ता व्यापार घाटा: ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार में भारत को 224 अरब डॉलर का नुकसान
अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंचों पर भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर हाल ही में नए आंकड़े जारी किए गए हैं, जो ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों के साथ देश के वाणिज्यिक असंतुलन को दर्शाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिक्स देशों के साथ कुल व्यापार में भारत को भारी घाटे का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी कुल राशि 224 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। इस बड़े व्यापार अंतर ने नीति निर्माताओं और आर्थिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि भारत दुनिया के कई प्रमुख उभरते बाजारों के साथ मजबूत आर्थिक साझेदारियां कायम करने में जुटा हुआ है।

प्रमुख देशों के साथ व्यापारिक स्थिति

ब्रिक्स समूह में चीन और रूस जैसे देश शामिल हैं, जिनके साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते लंबे समय से जटिल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, विशेष रूप से चीन के साथ व्यापार में आयात का पलड़ा भारी है, जिसके कारण कुल व्यापार घाटे में एक बड़ा हिस्सा उसी का बनता है। हालांकि रूस के साथ ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में लगातार सहयोग बढ़ रहा है, फिर भी कुल मिलाकर समूह के साथ संतुलन भारत के पक्ष में नहीं झुक पा रहा है। इस स्थिति की वजह से घरेलू स्तर पर कई प्रकार के उद्योग और बाजार प्रभावित होते हैं, जिससे आयात निर्भरता कम करने के उपायों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। आर्थिक जानकारों का मानना है कि इस तरह के व्यापक व्यापार घाटे को पाटने के लिए भारत को अपने निर्यात को बढ़ावा देना होगा और स्वदेशी मैन्युफैक्चरिंग को और अधिक मजबूत करना होगा। ब्रिक्स मंच के माध्यम से कूटनीतिक और आर्थिक संवाद जारी रखने के साथ-साथ यह भी आवश्यक हो गया है कि द्विपक्षीय समझौतों में ऐसे प्रावधान जोड़े जाएं जिससे घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिल सके। विशेष रूप से तकनीक, ऊर्जा और विनिर्माण के क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम करना इस असंतुलन से निपटने के लिए सबसे कारगर कदम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इस व्यापार घाटे के आंकड़ों पर संसद से लेकर विभिन्न व्यापारिक संगठनों में विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। सरकार की ओर से भी यह प्रयास किया जा रहा है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की स्थिति अधिक संतुलित और मजबूत हो सके। हालांकि इसमें समय लग सकता है, लेकिन ब्रिक्स देशों के साथ व्यापारिक प्राथमिकताओं की समीक्षा करना अब समय की मांग बन चुका है ताकि देश के दीर्घकालिक आर्थिक हितों की रक्षा की जा सके।
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