पाकिस्तानी सैन्य तंत्र ने बलूचिस्तान के भीतर अपने सामरिक और सुरक्षा हितों को साधने तथा क्षेत्र में जारी बलूच विद्रोह को कुचलने के लिए एक खतरनाक रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। इस योजना के तहत पूर्व अफगान सैनिकों को आकर्षक और भारी वेतन पैकेज का लालच देकर बलूचिस्तान बुलाया जा रहा है ताकि उनका इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर सैन्य अभियानों और कठोर कार्रवाइयों में किया जा सके। इस तरह के घटनाक्रम से क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर गहरा संकट मंडराता नजर आ रहा है और मानवाधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंताएं फिर से खड़ी हो गई हैं। पाकिस्तानी सेना द्वारा इस प्रकार के बाहरी और अनुभवी लड़ाकों को शामिल करना इस बात का संकेत देता है कि स्थानीय प्रतिरोध से निपटने के लिए पारंपरिक सैन्य बलों के अलावा भाड़े के सैनिकों जैसी रणनीतियों का सहारा लिया जा रहा है, जिससे इलाके में तनाव और हिंसा में भारी इजाफा होने की आशंका बनी हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में बलूचिस्तान का लंबा और जटिल इतिहास तथा पाकिस्तान के केंद्रीय प्रशासन के खिलाफ वहां चल रहा तीव्र असंतोष प्रमुख वजहों में शामिल है। दशकों से इस खनिज समृद्ध प्रांत के स्थानीय निवासी प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, राजनीतिक अधिकारों की कमी और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा मानवाधिकारों के कथित हनन के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं। बलूच राष्ट्रवादी संगठन लगातार इस्लामाबाद सरकार के खिलाफ संघर्षरत हैं, जिसे दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना समय-समय पर बड़े सैन्य अभियान चलाती रही है। अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद वहां के पूर्व सैनिकों और सुरक्षा कर्मियों की स्थिति काफी दयनीय हो गई थी, जिनमें से कई बेरोजगार होकर पलायन करने को मजबूर हुए हैं। पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व इसी संवेदनशीलता और लाचारी का फायदा उठाते हुए इन पूर्व अफगान सैनिकों को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के तहत इस्तेमाल करने की जुगत में है, क्योंकि इन सैनिकों के पास युद्ध का लंबा और खुरदुरा अनुभव है जिसका उपयोग बलूच बगावत को नेस्तनाबूद करने के लिए किया जा सके।
इस सैन्य रणनीति के दूरगामी और गंभीर परिणाम पूरे दक्षिण एशिया क्षेत्र विशेषकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कूटनीतिक संबंधों पर पड़ सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि पाकिस्तानी सेना द्वारा पूर्व अफगान सैनिकों को बलूचिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन करने या स्थानीय आबादी के खिलाफ खूनी संघर्ष में झोंका जाता है, तो इससे क्षेत्रीय अस्थिरता और अधिक गहरी हो जाएगी। इसके अलावा, बलूच स्वतंत्रता समर्थक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से इस कदम के खिलाफ वैश्विक मंचों पर तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है, जिससे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को और अधिक धक्का लगेगा। काबुल और इस्लामाबाद के बीच पहले से ही कई मोर्चों पर तनाव बना हुआ है, और ऐसे में अफगान नागरिकों या पूर्व सैनिकों को पाकिस्तानी सैन्य अभियानों में भाड़े के रूप में इस्तेमाल किए जाने से कूटनीतिक स्तर पर नए विवाद खड़े हो सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इस मामले पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या इस गुप्त लामबंदी को रोकने के लिए कोई कूटनीतिक दबाव बनाया जाता है या नहीं।