प्रकृति पर बढ़ता हुआ भारी दबाव
वर्तमान समय में हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव लगातार बनता जा रहा है जिसके कारण पूरी पृथ्वी का पारिस्थितिकी तंत्र खतरे की चपेट में आ गया है। आधुनिक विकास के नाम पर जंगलों की बेतरतीब कटाई हो रही है और प्राकृतिक आवासों को तेजी से नष्ट किया जा रहा है जिससे वन्यजीवों तथा विभिन्न प्रजातियों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगे हैं। नदियां सूख रही हैं, उपजाऊ जमीन बंजर होती जा रही है और वैश्विक तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने का यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है जिसके कारण आने वाले समय में मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए वैश्विक स्तर पर तुरंत और ठोस कदम उठाने की जरूरत है ताकि इस बढ़ते दबाव को कुछ हद तक कम किया जा सके और हमारी इस हरी-भरी पृथ्वी को बचाया जा सके।
संरक्षण कार्यों में दुनिया की विफलता
जैवविविधता संरक्षण के क्षेत्र में पूरी दुनिया के देश लगातार पिछड़ते जा रहे हैं और तय किए गए लक्ष्य समय पर पूरे नहीं हो पा रहे हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बड़े-बड़े दावे और समझौते किए जाते हैं परंतु धरातल पर उनका क्रियान्वयन बेहद लचर स्थिति में रहता है। सरकारें और संबंधित एजेंसियां प्रकृति को बचाने के लिए जो नीतियां बनाती हैं वे अक्सर कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं और वास्तविक परिणामों का भारी अभाव देखने को मिलता है। धन और संसाधनों की कमी का रोना रोकर कई देश अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट जाते हैं जबकि नीतिगत इच्छाशक्ति की कमी मुख्य बाधा बनी हुई है। संरक्षण अभियानों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को उचित महत्व नहीं दिया जाता है जिससे योजनाएं विफल हो जाती हैं। वनों की अंधाधुंध कटाई रोकने और विलुप्त हो रही प्रजातियों को बचाने के लिए जो कड़े कानून होने चाहिए उनका पालन सख्ती से नहीं कराया जाता है। इस प्रकार की प्रशासनिक और वैधानिक कमजोरियों के कारण जैवविविधता संरक्षण की दिशा में किए जाने वाले तमाम प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।
समस्या की पृष्ठभूमि और भविष्य की राह
पर्यावरण संरक्षण और जैवविविधता का यह मुद्दा आज का नहीं है बल्कि यह सदियों से चली आ रही मानवीय गतिविधियों और औद्योगिक विकास का परिणाम है। औद्योगिकीकरण की शुरुआत के बाद से ही हमने प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करना शुरू कर दिया था जिसके परिणाम आज हमारे सामने विकराल रूप में खड़े हैं। जब तक आम नागरिक से लेकर बड़ी सरकारों तक में पर्यावरण के प्रति सच्ची संवेदना और जागरूकता पैदा नहीं होगी तब तक स्थिति में सुधार होना असंभव है। शिक्षा प्रणाली में पर्यावरण अध्ययन को अनिवार्य बनाने के साथ-साथ विकास के ऐसे मॉडल अपनाने होंगे जो प्रकृति के अनुकूल हों और धारणीय विकास के सिद्धांतों पर आधारित हों। अंतरराष्ट्रीय संधियों का पालन सभी देशों के लिए अनिवार्य होना चाहिए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़े दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए। यदि समय रहते इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक बंजर और संकटग्रस्त दुनिया विरासत में मिलेगी जिसे सुधारना किसी के बस में नहीं होगा।