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रणनीतिक कूटनीति: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत के योगदान और गुट आधारित राजनीति से दूरी पर चर्चा
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की भूमिका को लेकर विशेषज्ञों ने अहम राय रखी है, जिसमें गुट आधारित राजनीति से दूरी बनाए रखने की वकालत की गई है।
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Ankit Yadav
14 सित 2026, 12:27
वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका और कूटनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर एक बार फिर गहन चर्चा शुरू हो गई है। हाल ही में सामने आए बयानों के अनुसार, आगामी या चल रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत का योगदान क्या होना चाहिए, इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों ने अपनी स्पष्ट राय रखी है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच भारत को किसी भी प्रकार की गुट-आधारित राजनीति या ध्रुवीकरण से पूरी तरह दूरी बनाकर रखनी चाहिए। यह दृष्टिकोण देश की रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है।
वैश्विक मंचों पर भारत की स्वतंत्र भूमिका
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लेकर देश के अन्य प्रमुख हिस्सों में भी कूटनीतिक मुद्दों पर लगातार मंथन चल रहा है कि कैसे वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज को बुलंद किया जाए। ब्रिक्स जैसे बड़े और प्रभावशाली संगठनों में भारत की मौजूदगी हमेशा से आर्थिक सहयोग, बहुपक्षीय विकास और वैश्विक शांति के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली रही है। जानकारों का कहना है कि भारत को अपने पारंपरिक स्वतंत्र विदेश नीति के सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए ऐसे मंचों का उपयोग केवल आर्थिक और तकनीकी साझेदारी को मजबूत करने के लिए करना चाहिए, न कि किसी भू-राजनीतिक खेमेबंदी का हिस्सा बनने के लिए।
ऐतिहासिक रूप से भी अयोध्या और अन्य सांस्कृतिक केंद्रों से जुड़ी हमारी वैचारिक भूमि ने हमेशा 'वसुधैव कुटुंबकम्' का संदेश दिया है, जो वैश्विक शांति की वकालत करता है। आज के दौर में जब दुनिया दो या अधिक स्पष्ट गुटों में बंटती नजर आ रही है, तब भारत के लिए यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह संतुलन की नीति का पालन करे। विशेषज्ञों का तर्क है कि ब्रिक्स के भीतर भारत की उपस्थिति विकासशील देशों के हितों की रक्षा करने और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार लाने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है, बशर्ते देश किसी भी पक्षपातपूर्ण गुटबाजी का शिकार न हो।
भविष्य की रणनीतियों को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही है कि भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में व्यापारिक सुगमता, डिजिटल बुनियादी ढांचे के साझाकरण और आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख जैसे रचनात्मक मुद्दों पर जोर देगा। जानकारों का सुझाव है कि कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना चाहिए और किसी भी ऐसे गठबंधन से बचना चाहिए जो उसकी वैश्विक स्वीकार्यता को प्रभावित कर सके। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत इन अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में अपनी स्वतंत्र छवि को किस प्रकार और अधिक मजबूत करता है।