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वैश्विक व्यापार बदलाव: भारत, रूस, चीन और ईरान समेत 20 ब्रिक्स देशों में लोकल करेंसी ट्रेड से किसे होगा सबसे ज्यादा फायदा?

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर के वर्चस्व को कम करने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन की संभावनाओं पर तेजी से विचार किया जा रहा है।

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Ankit Yadav
15 सित 2026, 14:05
वैश्विक व्यापार बदलाव: भारत, रूस, चीन और ईरान समेत 20 ब्रिक्स देशों में लोकल करेंसी ट्रेड से किसे होगा सबसे ज्यादा फायदा?
वैश्विक आर्थिक मंच पर इन दिनों एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है, जहां भारत, रूस, चीन और ईरान जैसे प्रमुख देश आपसी कारोबार के लिए अपनी स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। ब्रिक्स प्लस समूह के लगभग 20 देशों के बीच यदि पूरी तरह से घरेलू करंसी में व्यापार शुरू हो जाता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार की संरचना में एक ऐतिहासिक परिवर्तन आ सकता है। जानकारों का मानना है कि इस कदम से पारंपरिक वैश्विक वित्तीय प्रणालियों पर निर्भरता कम होगी और सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूती मिलेगी।

डॉलर पर निर्भरता घटने के मायने

अमेरिकी डॉलर की मजबूत पकड़ को कमजोर करने की यह मुहिम दुनिया भर के उभरते बाजारों के लिए नए द्वार खोल रही है। जब देश डॉलर के बजाय अपने खुद के नोटों या आपसी सहमति वाली मुद्राओं के जरिए आयात-निर्यात करेंगे, तो उन्हें विदेशी मुद्रा भंडार पर आने वाले भारी दबाव से बड़ी राहत मिलेगी। विशेष रूप से रूस और ईरान जैसे देशों पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद से स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करना उनकी अर्थव्यवस्था के लिए एक संजीवनी बूटी की तरह काम कर रहा है, जिससे वे पश्चिमी वित्तीय तंत्र के प्रभाव से बाहर निकलकर स्वतंत्र रूप से व्यापार कर पा रहे हैं। चीन और भारत जैसे विशाल बाजार इस व्यवस्था के सबसे बड़े केंद्र के रूप में उभर सकते हैं क्योंकि दोनों देशों की अर्थव्यवस्था का दायरा बहुत बड़ा है और वे कई अन्य राष्ट्रों के साथ बड़े पैमाने पर वस्तुओं का आदान-प्रदान करते हैं। जब घरेलू करंसी में लेनदेन होगा, तो विनिमय दर के जोखिम कम होंगे और आयातकों तथा निर्यातकों दोनों के लिए लागत में भारी कमी आएगी। इसके अलावा, इससे व्यापारिक प्रक्रियाओं में लगने वाला समय भी बचेगा और नौकरशाही की अड़चनों से काफी हद तक निजात मिलेगी। भविष्य की रणनीतियों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि ब्रिक्स देशों का यह कदम वैश्विक दक्षिण के देशों को अधिक आर्थिक स्वायत्तता प्रदान करेगा। आने वाले समय में अन्य विकासशील देश भी इस मोर्चे पर जुड़ सकते हैं, जिससे वैश्विक व्यापार का संतुलन पश्चिमी देशों से हटकर एशियाई और अन्य विकासशील महाद्वीपों की ओर स्थानांतरित हो सकता है। यह बदलाव केवल एक मौद्रिक सुधार नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक दृष्टि से भी एक बहुत बड़ा संदेश है जो आने वाले दशकों में दुनिया की आर्थिक दिशा तय करेगा।
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