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शिक्षा

बदलता रुझान: विदेश में पढ़ाई को लेकर Gen-Z का घटा मोह, अमेरिका में सबसे ज्यादा कम हुई दिलचस्पी

हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि आज की युवा पीढ़ी यानी Gen-Z का विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के प्रति रुझान तेजी से कम हो रहा है, जिसमें अमेरिका को लेकर छात्रों की दिलचस्पी में सबसे भारी गिरावट दर्ज की गई है।

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Ankit Yadav
03 सित 2026, 16:33
बदलता रुझान: विदेश में पढ़ाई को लेकर Gen-Z का घटा मोह, अमेरिका में सबसे ज्यादा कम हुई दिलचस्पी
वैश्विक स्तर पर छात्रों की प्राथमिकताओं में आ रहे बड़े बदलाव ने शिक्षा जगत का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। हाल ही में आई एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, आधुनिक युवा पीढ़ी जिसे आमतौर पर Gen-Z कहा जाता है, अब विदेशों में जाकर पढ़ाई करने को लेकर उतनी उत्सुक नहीं है जितनी पिछली पीढ़ियां हुआ करती थीं। इस बदलते समीकरण के कारण कई पारंपरिक रूप से लोकप्रिय शैक्षणिक गंतव्यों को लेकर छात्रों के रुख में भारी परिवर्तन देखा जा रहा है।

अमेरिका के प्रति आकर्षण में आई सबसे बड़ी गिरावट

शैक्षणिक मोर्चे पर सबसे बड़ा झटका अमेरिका को लगा है, जिसे लंबे समय से उच्च शिक्षा के लिए दुनिया भर के छात्रों का मक्का माना जाता था। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के प्रति युवाओं की दिलचस्पी में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इस रूख के पीछे वीजा से जुड़ी जटिलताएं, आसमान छूती ट्यूशन फीस, रहने-खाने का भारी खर्च और पढ़ाई के बाद जॉब मार्केट में बढ़ती अनिश्चितता जैसे तमाम आर्थिक और व्यावहारिक कारण जिम्मेदार बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं की यह सोच केवल एक अस्थायी बदलाव नहीं है, बल्कि यह उनकी प्राथमिकताओं में आए एक गहरे बदलाव का संकेत है। आज के युवा अपने करियर को लेकर अधिक व्यावहारिक और सतर्क दृष्टिकोण अपना रहे हैं। वे अत्यधिक कर्ज लेकर या अपनी वित्तीय स्थिति को जोखिम में डालकर विदेश जाने के बजाय अपने ही देश में या फिर अन्य उभरते हुए विकल्पों पर विचार करना बेहतर समझ रहे हैं। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर उच्च शिक्षा के बेहतर और किफायती संस्थान उपलब्ध होने के कारण भी छात्रों का रुझान बदला है।

भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव और संभावित परिणाम

इस नए ट्रेंड का असर केवल छात्रों के व्यक्तिगत फैसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों की नीतियों पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है। जिन देशों की अर्थव्यवस्था काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय छात्रों की फीस और खर्चों पर निर्भर करती है, उन्हें अब अपनी नीतियों में बदलाव करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। यदि यह प्रवृत्ति ऐसे ही जारी रही, तो आने वाले समय में वैश्विक शिक्षा बाजार में एक नया संतुलन देखने को मिल सकता है, जिससे पारंपरिक रूप से मजबूत माने जाने वाले पश्चिमी देशों के शिक्षण संस्थानों को अपनी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार करना होगा।
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