पारंपरिक नौकरी को ठुकराकर खेती में कदम छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर अंचल से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो आधुनिक युवाओं के लिए लीक से हटकर सोचने का बड़ा उदाहरण पेश करती है। उच्च शिक्षा के तहत मास्टर इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की डिग्री हासिल करने के बाद अधिकांश युवा महानगरों की बड़ी कंपनियों में ऊंचे पैकेज वाली नौकरियों की तलाश में जुट जाते हैं। परंतु ईशांश ने इस स्थापित ढर्रे पर चलने के बजाय अपनी मातृभूमि में रहकर कृषि क्षेत्र में कुछ नया करने का साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने अपनी व्यावसायिक प्रबंधन की शिक्षा और रणनीतिक समझ का उपयोग किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खुद की जमीन पर नारियल की बागवानी स्थापित करने के लिए किया। आज के समय में जब खेती को घाटे का सौदा मानकर ग्रामीण इलाकों के युवा शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं, ऐसे में बस्तर के इस युवा ने यह साबित कर दिखाया है कि सही प्रबंधन, वैज्ञानिक तरीकों और अटूट मेहनत के बल पर कृषि के जरिए भी कॉर्पोरेट घरानों जैसी सफलता और मोटी कमाई हासिल की जा सकती है।
नारियल की बागवानी से बस्तर में आर्थिक सफलता छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता और भौगोलिक विशिष्टता के लिए जाना जाता है, जहां पारंपरिक रूप से धान और वनोंपज पर आधारित आजीविका का चलन रहा है। ऐसे माहौल में नारियल जैसी नकदी फसल की व्यावसायिक खेती करना एक जोखिम भरा और अनूठा प्रयोग माना जा रहा था। ईशांश ने अपने इस कृषि स्टार्टअप के तहत वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए नारियल के पौधे लगाए और उनकी देखभाल के लिए आधुनिक कृषि दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन किया। प्रबंधन की अपनी पढ़ाई के दौरान सीखे गए लागत नियंत्रण, बाजार की मांग और आपूर्ति के सिद्धांतों को उन्होंने अपने खेतों में उतारा। शुरुआती दौर में इस तरह के चुनौतीपूर्ण फैसले के परिणाम को लेकर संशय बना रहता है, लेकिन उनकी निरंतर मेहनत और सही दिशा में किए गए प्रयासों के फलस्वरूप पौधों ने फल देना शुरू कर दिया। बाजार में नारियल की लगातार बनी रहने वाली मांग और सही मूल्य संवर्धन के कारण उन्हें इस फसल से लाखों रुपये की आमदनी प्राप्त हुई है, जिसने स्थानीय कृषि परिदृश्य में एक नया मानदंड स्थापित किया है।
क्षेत्र के युवाओं के लिए बनी नई प्रेरणा बस्तर के इस युवा की यह सफलता केवल उसके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे अंचल के ग्रामीण युवाओं के लिए एक मजबूत प्रेरणास्त्रोत के रूप में उभर रही है। जब युवा यह देखते हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाला कोई व्यक्ति अपनी माटी से जुड़कर पारंपरिक खेती को आधुनिक व्यवसाय में बदल सकता है, तो उनकी सोच में भी सकारात्मक बदलाव आने लगता है। स्थानीय कृषि विशेषज्ञों और किसानों का मानना है कि इस तरह के सफल प्रयोग आने वाले समय में क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे। लोग अब धान की पारंपरिक खेती के साथ-साथ बागवानी और नकदी फसलों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, जिससे आय के नए स्रोत पैदा हो रहे हैं। ईशांश की इस उपलब्धि ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि युवाओं के पास स्पष्ट दृष्टि, जोखिम उठाने का साहस और आधुनिक प्रबंधन कौशल हो, तो वे ग्रामीण भारत में ही रहकर रोजगार के अपार अवसर पैदा कर सकते हैं और आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकते हैं।