रामघाट पर हुई दुर्घटना और इलाज की कोशिश
घटना की शुरुआत 21 अक्टूबर की शाम को हुई जब मनेर नगर परिषद के रामघाट इलाके में देवी की मूर्तियों का विसर्जन किया जा रहा था। इसी दौरान जल राशि में गहरे पानी में चले जाने से संजीत कुमार नामक युवक दुर्घटना का शिकार हो गया और वह पानी में डूब गया। आसपास मौजूद लोगों ने तुरंत पानी से निकालकर उसकी जान बचाने के लिए भारी मशक्कत शुरू कर दी। परिवार के लोगों और स्थानीय निवासियों ने मिलकर उसे फौरन मनेर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया ताकि उसका समय पर चिकित्सीय उपचार शुरू हो सके। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उसका प्राथमिक उपचार किया लेकिन उसकी गंभीर हालत को देखते हुए उसे अन्यत्र रेफर करने का निर्णय लिया गया। यहीं से अस्पताल प्रशासन की बड़ी लापरवाही और संवेदनहीनता का ऐसा मामला सामने आया जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। सरकारी अस्पताल परिसर के भीतर दो-दो गाड़ियां खड़ी होने के बावजूद पीड़ित परिवार को वाहन की सुविधा मुहैया नहीं कराई गई। डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा यह दलील दी गई कि दोनों गाड़ियों में ऑक्सीजन की सुविधा उपलब्ध नहीं है इसलिए वे रोगी को वाहन नहीं दे सकते। इस प्रकार अस्पताल के जिम्मेदारों ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया और एक तड़पते हुए मरीज को बिना किसी आधिकारिक सहायता के यूं ही छोड़ दिया।
मोटरसाइकिल पर लादकर ले जाने की मजबूरी
अस्पताल प्रशासन से वाहन न मिलने के कारण परिवार और वहां मौजूद आम नागरिकों के सामने भारी संकट खड़ा हो गया। रोगी की नाजुक हालत को देखते हुए वहां रुकना संभव नहीं था इसलिए लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर एक नया रास्ता चुना। उन्होंने संजीत कुमार को एक मोटरसाइकिल पर बीच में बैठाया और किसी तरह उसे दूसरे निजी अस्पताल की तरफ ले जाने लगे। वाहन के अभाव में दो पहिया वाहन पर लादकर ले जाने के दौरान रास्ते में उसकी शारीरिक स्थिति और अधिक बिगड़ती चली गई। आखिरकार जब उसे किसी तरह एक निजी चिकित्सालय में पहुंचाया गया तो वहां मौजूद चिकित्सकों ने उसकी जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। इस दुखद और अवांछित घटना के बाद से स्थानीय निवासियों और परिजनों में प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश व्याप्त हो गया है। लोगों का स्पष्ट रूप से यह कहना है कि यदि अस्पताल में तैनात जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते रोगी को वाहन उपलब्ध करा दिया होता तो शायद उसकी जान बचाई जा सकती थी। इस बीच मौके पर मौजूद रहे एक पुलिस पदाधिकारी ने स्थिति का जायजा लेते हुए बताया कि स्वास्थ्य केंद्र से मामला रेफर होने के बाद पुलिस के आधिकारिक वाहन के जरिए उसे आगे के इलाज के लिए ले जाया गया था। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जो देरी हुई उसने चिकित्सा व्यवस्था की पोल खोल दी और एक बहुमूल्य जीवन हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
प्रशासनिक लापरवाही पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरी दर्दनाक घटना के बाद पूरे इलाके में स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। मृतक की पहचान मनेर नगर क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले वार्ड नंबर एक के निवासी के रूप में की गई है जिसके पिता का नाम सुरेश पासवान है। एक पर्व के उल्लास के बीच इस तरह एक युवा बेटे की असमय मौत हो जाने से उसके पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की मांग की है ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को इस तरह की लाचारी का सामना न करना पड़े। उनका तर्क है कि जब सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आपातकालीन सेवाओं के लिए गाड़ियां मौजूद रहती हैं तो कागजी बहानों या ऑक्सीजन की कमी का हवाला देकर किसी जरूरतमंद को मना करना पूरी तरह से अमानवीय है। इस मामले ने सरकारी अस्पतालों के दावों की पोल खोल दी है जहां आपात स्थिति में भी मरीजों को बुनियादी सुविधाएं नसीब नहीं होती हैं। लोग अब यह मांग कर रहे हैं कि इस लापरवाही के लिए दोषी पाए जाने वाले सभी स्वास्थ्य कर्मियों और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। इस दुखद हादसे ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर चिकित्सा व्यवस्था कितनी बदहाल स्थिति में पहुंच चुकी है।