धधरा गांव में शौचालय की दुर्दशा
बाराबंकी जिले के निंदूरा ब्लॉक अंतर्गत धधरा गांव में सरकार द्वारा लाखों रुपये की लागत से एक सामुदायिक शौचालय का निर्माण कराया गया था। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य गांव के निवासियों को स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराना था ताकि खुले में शौच की कुप्रथा को समाप्त किया जा सके। हालांकि, वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है क्योंकि यह महत्वपूर्ण केंद्र पिछले छह महीनों से पूरी तरह बंद पड़ा है। ग्रामीणों को इस सरकारी सुविधा का लाभ बिल्कुल भी नहीं मिल पा रहा है। शौचालय के प्रवेश द्वार पर ताला लटके होने के कारण यह भवन पूरी तरह से अनुपयोगी बना हुआ है। सरकारी धन का उपयोग करके बनाई गई यह संपत्ति अब देखरेख के अभाव और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ती हुई दिखाई दे रही है। स्थानीय लोगों के लिए यह शौचालय एक सफेद हाथी बनकर रह गया है जिसका कोई भी उपयोग जमीनी स्तर पर नहीं हो रहा है और योजना का मूल उद्देश्य पूरी तरह से विफल हो गया है।
ग्रामीणों की परेशानी और मांग
गांव के निवासी आमिर आलम और सलीम समेत अन्य ग्रामीणों ने इस अव्यवस्था पर गंभीर नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि शौचालय के बंद होने की वजह से उन्हें अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए खुले खेतों और आसपास के इलाकों में जाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। विशेष रूप से बारिश के मौसम के दौरान स्थिति अत्यंत कठिन हो जाती है क्योंकि खुले में शौच जाने के दौरान जहरीले जीव-जंतुओं के काटने और अन्य खतरों का डर हमेशा बना रहता है। इस गंभीर समस्या को देखते हुए ग्रामीणों ने स्थानीय अधिकारियों से मांग की है कि सामुदायिक शौचालय के ताले को तुरंत प्रभाव से खुलवाया जाए। उन्होंने प्रशासन से यह भी सुनिश्चित करने का आग्रह किया है कि भविष्य में यह सुविधा बिना किसी रुकावट के चालू रहे ताकि गांव की जनता को इसका वास्तविक लाभ मिल सके। ग्रामीणों के अनुसार, सार्वजनिक धन का उपयोग करके बनाई गई इस सुविधा का बंद रहना न केवल सरकारी नीति की विफलता है बल्कि एक जनहित से जुड़ी सेवा का अपमान भी है।
योजना की विफलता और स्वास्थ्य जोखिम
धधरा गांव में सामुदायिक शौचालय का छह महीने से बंद रहना इस सरकारी योजना की प्रभावशीलता पर बड़े सवाल खड़े करता है। जिस व्यवस्था को ग्रामीणों के स्वास्थ्य और स्वच्छता के स्तर को सुधारने के लिए तैयार किया गया था, वह आज खुद ही जर्जर अवस्था की ओर बढ़ रही है। लंबे समय तक संचालन न होने के कारण यह शौचालय न केवल बेकार हो गया है बल्कि ग्रामीणों के लिए मुसीबत का सबब भी बन चुका है। बरसात के दिनों में खुले में जाना न केवल एक सामाजिक मजबूरी है बल्कि यह स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जोखिमों को भी आमंत्रित करता है। जहरीले सांपों और अन्य कीड़ों का खतरा होने के कारण ग्रामीण हर दिन एक असुरक्षित वातावरण में रहने को मजबूर हैं। जब तक जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में संज्ञान लेकर शौचालय का संचालन पुन: शुरू नहीं कराते, तब तक ग्रामीण इस कठिन स्थिति से बाहर नहीं निकल पाएंगे। यह मामला स्पष्ट रूप से प्रशासनिक जवाबदेही की कमी को दर्शाता है, जिसे सुधारा जाना अत्यंत आवश्यक है ताकि ग्रामीणों को उनकी मूलभूत सुविधा वापस मिल सके।